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Class 9 Sanskrit

Chapter 2 — सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलम् अर्थः

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Overview

Summary

पाठ 2 — Class 9 Sanskrit NCERT textbook (Sharda), 'Sukhasya Mulam Dharmah' — यह पाठ कौटिल्य के अर्थशास्त्र के प्रसिद्ध सूत्र 'सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः' पर आधारित है, जो आर्थिक साक्षरता, न्यायपूर्ण धनोपार्जन, औचित्यपूर्ण व्यय तथा दीर्घकालीन सञ्चय के महत्त्व को जीवनमूल्यों से जोड़ता है।

  • धर्म-अर्थ-सुख का परस्परसम्बन्धपाठ का केन्द्रीय विचार यह है कि वास्तविक सुख का आधार धर्म है और धर्मपालन का आधार अर्थ (धन) है। जो जन न्यायपूर्वक अर्थोपार्जन करता है, वही धर्मपालन में समर्थ होता है और दीर्घकालिक सुख प्राप्त करता है। धर्म, अर्थ और सुख — इन तीनों का परस्परसम्बन्ध अविच्छिन्न बताया गया है।
  • स्वस्थ आर्थिकव्यवहार के तीन स्तम्भपाठ के अनुसार स्वस्थ आर्थिकव्यवहार तीन प्रकार का होता है — (१) न्यायपूर्णम् अर्थोपार्जनम् : सन्मार्ग से धन कमाना, अनैतिक व्यवहार वर्जित; (२) औचित्यपूर्णः व्ययः : स्वास्थ्य, शिक्षा और आत्मसुरक्षा के लिए आवश्यक व्यय करना, आडम्बरपूर्ण व्यय त्यागना; (३) भविष्यदृष्ट्या सञ्चयः : उपार्जित धन का एक भाग भविष्य के लिए संचित करना, जिससे व्यक्ति स्वावलम्बी और स्वाभिमानी बनता है।
  • छात्रजीवन में आर्थिकसाक्षरतापाठ में छात्रों के अपव्यय की विशेष चर्चा है — त्वरित आहार, शीतपेय, पुटीकृत भोजन, प्रदर्शनकारी परिधान आदि पर अनावश्यक व्यय धन और स्वास्थ्य दोनों को हानि पहुँचाता है। भौतिकतावादी युग के आकर्षण से बचकर अर्थविषयक सचेतनता ही आर्थिक सम्पन्नता का मार्ग है। जो विद्यार्थी आज अर्थ-जागरूक है, वही भविष्य में उत्तरदायी नागरिक बनता है।
  • सञ्चय, निवेश और चक्रवृद्ध्यंशपाठ में चक्रवृद्ध्यंश (compound interest) का व्यावहारिक उदाहरण दिया गया है — ₹1000 का 10% वार्षिक चक्रवृद्धि पर निवेश दशवर्षों में ₹2,593.74 बन जाता है। लघु-लघु सञ्चय भी कालान्तर में महत्सम्पत्ति बनती है। भारत सरकार की योजनाओं — प्रधानमन्त्री जनधन योजना, सुकन्या समृद्धि योजना, सार्वजनिक भविष्य निधि, राष्ट्रीय संचय प्रमाणपत्र आदि — का उल्लेख समीपस्थ वित्तागार या पत्रालय से जानकारी प्राप्त करने के निर्देश के साथ किया गया है।
Essentials

Key points & formulas

  1. 01विधा — गद्यपाठः (संस्कृत गद्य; भारतीय धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र एवं नीतिग्रन्थों के सूक्तियों पर आधारित)
  2. 02केंद्रीय भाव — 'सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः' — न्यायपूर्वक अर्जित धन → धर्मपालन → दीर्घकालिक सुख; धर्म-अर्थ-सुख का अविच्छिन्न परस्परसम्बन्ध
  3. 03प्रमुख श्लोक — 'जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। स क्रमः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥' (भावार्थ — जैसे जल की बूँद-बूँद से घड़ा भरता है, उसी प्रकार विद्या, धर्म और धन का संग्रह भी क्रमशः ही होता है; यह श्लोक चाणक्यनीति से उद्धृत है)
  4. 04प्रमुख श्लोक — 'क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत्। क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम्॥' (भावार्थ — क्षण-क्षण में विद्या और कण-कण में धन अर्जित करना चाहिए; क्षण खो दें तो विद्या कहाँ, कण गँवा दें तो धन कहाँ)
  5. 05प्रमुख श्लोक — 'ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय धर्ममर्थं च चिन्तयेत्।' (भावार्थ — दिन के आरम्भ में धर्म और अर्थ का चिन्तन करना चाहिए; यह गरुडपुराण से उद्धृत है)
  6. 06शब्दार्थ — अपव्ययः = फिजूलखर्ची (wasteful expenditure); अर्थोपार्जनम् = धन कमाना (earning money); स्वावलम्बी = आत्मनिर्भर (self-reliant); चक्रवृद्ध्यंशः = चक्रवृद्धि ब्याज (compound interest); मूलभूतानाम् आवश्यकतानाम् = मूलभूत आवश्यकताओं का (of basic needs)
Questions

Frequently asked questions

01

Sukhasya Mulam Dharmah summary in Sanskrit

यह पाठ कौटिल्य के अर्थशास्त्र के सूत्र पर आधारित है जो बताता है कि सुख का मूल धर्म है और धर्म का मूल अर्थ (धन) है। पाठ में न्यायपूर्ण अर्थोपार्जन, औचित्यपूर्ण व्यय और भविष्य के लिए सञ्चय — इन तीन आर्थिक व्यवहारों का विस्तार से वर्णन है, साथ ही छात्रों को आर्थिक साक्षरता का सन्देश दिया गया है।

02

Sharda Class 9 Chapter 2 PDF

Class 9 Sanskrit NCERT पुस्तक 'शारदा' के अध्याय 2 का शीर्षक है 'सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलम् अर्थः'। यह अध्याय आर्थिक साक्षरता और धर्म-अर्थ-सुख के परस्परसम्बन्ध पर केन्द्रित है।

03

सुखस्य मूलं धर्मः यह वाक्य किस ग्रन्थ में है?

'सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः' यह प्रसिद्ध सूत्ररूप वाक्य कौटिल्य के अर्थशास्त्र में है, जैसा इस पाठ में स्पष्ट उल्लेख है।

04

जलबिन्दुनिपातेन श्लोक किस ग्रन्थ से है?

पाठ के अनुसार 'जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। स क्रमः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥' यह श्लोक चाणक्यनीति से उद्धृत है।

05

स्वस्थ आर्थिकव्यवहार कितने प्रकार का है? (Class 9 Sanskrit)

पाठ के अनुसार स्वस्थ आर्थिकव्यवहार तीन प्रकार का है — (१) न्यायपूर्णम् अर्थोपार्जनम् (न्यायसंगत धनार्जन), (२) औचित्यपूर्णः व्ययः (उचित एवं आवश्यक व्यय), (३) भविष्यदृष्ट्या सञ्चयः (भविष्य के लिए बचत)।

06

चक्रवृद्ध्यंश का अर्थ क्या है? (शारदा कक्षा 9)

पाठ में दिए 'अत्र इदम् अवधेयम्' खण्ड के अनुसार चक्रवृद्ध्यंश वह ब्याज है जिसमें मूलधन के साथ-साथ अर्जित ब्याज पर भी ब्याज मिलता है, जिससे कालान्तर में धन अतिशीघ्र बढ़ता है।

07

गरुडपुराण में क्या उपदेश है? (Sanskrit Class 9 Chapter 2)

पाठ में गरुडपुराण से उद्धृत है — 'ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय धर्ममर्थं च चिन्तयेत्।' अर्थात् दिन के आरम्भ में (ब्राह्म मुहूर्त में उठकर) धर्म और अर्थ दोनों का चिन्तन करना चाहिए।

08

मनुस्मृति में अर्थशौच के बारे में क्या कहा गया है?

पाठ में मनु के अनुसार उद्धृत है — 'सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्। योऽर्थे शुचिः हि सः शुचिः न मृद्वारिशुचिः शुचिः॥' — अर्थात् सब प्रकार की शुद्धियों में अर्थशुद्धि (आर्थिक ईमानदारी) सर्वश्रेष्ठ है।

09

छात्रों को अपव्यय से कैसे बचना चाहिए? (Sharda Class 9)

पाठ के अनुसार छात्र माता-पिता के कष्टार्जित धन का तुच्छ कारणों से अपव्यय करते हैं — त्वरित आहार, शीतपेय, पुटीकृत भोजन, प्रदर्शनकारी परिधान आदि पर। इससे धनहानि के साथ-साथ स्वास्थ्यहानि भी होती है। उचित व्यय का लेखा रखना और उसका परिशीलन करना आवश्यक बताया गया है।

10

पाठ में कौन-कौन सी सरकारी योजनाओं का उल्लेख है?

पाठ में प्रधानमन्त्री जनधन योजना, सुकन्या समृद्धि योजना, सार्वजनिक भविष्य निधि, वरिष्ठ नागरिक संचय योजना, किसान विकास पत्र, राष्ट्रीय संचय प्रमाणपत्र, राष्ट्रीय पेंशन योजना, नियतनिक्षेप (FD) और आवृत्तिनिक्षेप (RD) का उल्लेख है।

11

स्वावलम्बन का मूल क्या है? (Class 9 Sanskrit Sharda Ch 2)

पाठ के अनुसार 'स्वावलम्बनं स्वाभिमानस्य मूलं वर्तते।' सञ्चय के अभ्यास से जन स्वावलम्बी बनता है, और संकटकाल में भी स्वाभिमानी जन दूसरों की आर्थिक सहायता नहीं माँगता।

12

क्षणशः कणशश्चैव श्लोक का भावार्थ क्या है?

पाठ में अन्त में उद्धृत श्लोक 'क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत्। क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम्॥' का आशय है कि विद्या क्षण-क्षण परिश्रम से और धन कण-कण बचत से अर्जित होता है — समय और अल्पधन की भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

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