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Class 9 Sanskrit

Chapter 13 — परिशिष्टम् २: समासः

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Overview

Summary

परिशिष्ट 2 — Class 9 Sanskrit NCERT textbook (Sharda), 'Samasah' — समास वह प्रक्रिया है जिसमें अर्थयुक्त दो या अधिक पद मिलकर एक पद बन जाते हैं; इसके चार मुख्य भेद हैं — तत्पुरुष, द्वन्द्व, बहुव्रीहि और अव्ययीभाव।

  • समास — परिभाषा एवं संरचनासमसनं समासः — अर्थात् संक्षेपण ही समास है। अर्थयुक्त पद-द्वय, पद-त्रय अथवा अनेक पद मिलकर एक पद बनते हैं, जैसे 'महा' + 'पुरुष' = महापुरुषः। समास में पूर्वपद और उत्तरपद — दो भाग होते हैं; दोनों प्रातिपदिकरूप में रहते हैं और समस्त पद से विभक्ति जोड़ी जाती है। समासे कृते विग्रहवाक्यम् समास के अर्थ को स्पष्ट करता है, जैसे 'राष्ट्रनायकः' का विग्रह 'राष्ट्रस्य नायकः'। विग्रह दो प्रकार के होते हैं — स्वपदविग्रह (समास के पदों से ही विग्रह, जैसे कृष्णसखा → कृष्णस्य सखा) और अस्वपदविग्रह (समास से भिन्न पदों से विग्रह, जैसे यथामति → मतिम् अनतिक्रम्य)।
  • समास के भेद एवं प्रधानतासमास मुख्यतः दो प्रकार का है — केवलसमास (तत्पुरुषादि संज्ञाओं से रहित, जैसे भूतपूर्वः) और विशेषसमास (चार भेद)। विशेषसमास के चार मुख्य भेद: (१) तत्पुरुषसमास — उत्तरपदार्थप्रधान, जैसे रामदूतः; (२) द्वन्द्वसमास — उभयपदार्थप्रधान, जैसे राजेशसुरेशौ; (३) बहुव्रीहिसमास — अन्यपदार्थप्रधान, जैसे पीताम्बरः (विष्णुः); (४) अव्ययीभावसमास — पूर्वपदार्थप्रधान, जैसे उपनगरम्।
  • तत्पुरुषसमास — भेद एवं उदाहरणतत्पुरुषसमास उत्तरपदार्थप्रधान है। इसके अन्तर्गत ये उपभेद आते हैं: (१) विभक्तितत्पुरुष (षड्विध) — द्वितीया: गृहगतः; तृतीया: नखभिन्नः; चतुर्थी: गोहितम्; पञ्चमी: चोरभयम्; षष्ठी: वृक्षमूलम्; सप्तमी: कार्यकुशलः। (२) कर्मधारयसमास (नवधा) — विशेषणपूर्वपद: नीलमेघः; उपमानपूर्वपद: मेघश्यामः; उपमानोत्तरपद: नरव्याघ्रः; मध्यमपदलोप: शाकपार्थिवः; मयूरव्यंसकादि: देशान्तरम् आदि। (३) द्विगुसमास (त्रिविध) — समाहारद्विगु: त्रिलोकम्; तद्धितार्थद्विगु: षाण्मातुरः; उत्तरपदद्विगु: पञ्चगवधनः। (४) नञ्-प्रभृतितत्पुरुष (पञ्चविध) — नञ्: अधर्मः; कु: कुपुत्रः; प्रादि: प्राचार्यः; उपपद: कुम्भकारः; एकदेशी: अर्धग्रामः।
  • द्वन्द्व, बहुव्रीहि और अव्ययीभावसमासद्वन्द्वसमास (उभयपदार्थप्रधान) के दो भेद: (क) इतरेतरद्वन्द्व — द्विपद: रामकृष्णौ; बहुपद: रामकृष्णसुरेशगिरीशाः। (ख) समाहारद्वन्द्व — संज्ञापरिभाषम्; नित्यसमाहार: पाणिपादम्। बहुव्रीहिसमास (अन्यपदार्थप्रधान) के दो वर्ग: (क) सामान्यबहुव्रीहि (षोढा) — द्वितीयार्थ: प्राप्तोदकः; षष्ठ्यर्थ: पीताम्बरः (विष्णुः); तृतीयार्थ: पीतक्षीरः आदि। (ख) विशेषबहुव्रीहि (नवधा) — व्यधिकरण: चक्रपाणिः; नञर्थ: अपुत्रः; उपमानपूर्वपद: गजाननः; प्रादि: निष्कृपः आदि। अव्ययीभावसमास (पूर्वपदार्थप्रधान) के प्रसिद्ध भेद: समीपार्थ: उपग्रामम्; अभावार्थ: निर्मशकम्; योग्यतार्थ: अनुरूपम्; वीप्सार्थ: प्रतिदिनम्; मर्यादार्थ: आमुक्ति; सादृश्यार्थ: ससखि; आदि — कुल प्रायः तेंतीस भेद।
Essentials

Key points & formulas

  1. 01समास — परिभाषा: अर्थयुक्त अनेक पदों का एकीभवन (समसनं = सङ्क्षेपणम्)
  2. 02पूर्वपद + उत्तरपद → प्रातिपदिक → समस्त पद + विभक्ति (यथा सीतापतिः)
  3. 03विग्रहवाक्य — स्वपदविग्रह (कृष्णसखा → कृष्णस्य सखा) और अस्वपदविग्रह (यथामति → मतिम् अनतिक्रम्य)
  4. 04समास के भेद — तत्पुरुष (उत्तरपदप्रधान), द्वन्द्व (उभयपदप्रधान), बहुव्रीहि (अन्यपदप्रधान), अव्ययीभाव (पूर्वपदप्रधान)
  5. 05तत्पुरुष के उपभेद — विभक्तितत्पुरुष (षड्विध), कर्मधारय (नवधा), द्विगु (त्रिविध), नञ्-प्रभृति (पञ्चविध)
  6. 06द्वन्द्व — इतरेतर (द्विपद/बहुपद) और समाहार (संज्ञापरिभाषम्/पाणिपादम्)
  7. 07बहुव्रीहि — सामान्य (षोढा: प्राप्तोदकः, पीताम्बरः आदि) और विशेष (नवधा: चक्रपाणिः, गजाननः आदि)
  8. 08अव्ययीभाव — प्रायः ३३ भेद; प्रमुख: उपग्रामम् (समीप), निर्मशकम् (अभाव), अनुरूपम् (योग्यता), प्रतिदिनम् (वीप्सा)
  9. 09समास-निर्णय: प्रधान पद की पहचान क्रियापद के साथ अन्वय से होती है
  10. 10केवलसमास vs विशेषसमास — केवलसमास तत्पुरुषादि संज्ञाओं से रहित (भूतपूर्वः)
Questions

Frequently asked questions

01

समास किसे कहते हैं?

अर्थयुक्त दो या अधिक पदों का मिलकर एक पद बन जाना समास है — 'समसनं समासः'। यह सङ्क्षेपण की प्रक्रिया है, जैसे महा + पुरुष = महापुरुषः।

02

समास के कितने भेद हैं?

मुख्यतः दो: केवलसमास और विशेषसमास। विशेषसमास के चार भेद — तत्पुरुष, द्वन्द्व, बहुव्रीहि और अव्ययीभाव।

03

तत्पुरुष समास के उदाहरण क्या हैं?

रामदूतः (रामस्य दूतः), गृहगतः (गृहं गतः), चोरभयम् (चोरात् भयम्), वृक्षमूलम् (वृक्षस्य मूलम्), नीलमेघः, मेघश्यामः, कुम्भकारः — ये सभी तत्पुरुष के उदाहरण हैं।

04

समास-विग्रह क्या होता है?

समस्त पद के अर्थ को स्पष्ट करने वाला वाक्य विग्रहवाक्य कहलाता है। यह दो प्रकार का होता है — स्वपदविग्रह (समास के अपने पदों से) और अस्वपदविग्रह (समास से भिन्न पदों से)।

05

द्वन्द्व समास किसे कहते हैं और उसके उदाहरण क्या हैं?

जिस समास में दोनों पदों का अर्थ प्रधान हो वह द्वन्द्व है। उदाहरण: रामश्च कृष्णश्च = रामकृष्णौ; संज्ञा च परिभाषा च = संज्ञापरिभाषम्; पाणी च पादौ च = पाणिपादम्।

06

बहुव्रीहि समास क्या है? उदाहरण दें।

जिस समास में दोनों पदों का अर्थ प्रधान न होकर किसी अन्य पद का बोध हो वह बहुव्रीहि है। जैसे पीताम्बरः — पीतम् अम्बरं यस्य सः (विष्णुः); गजाननः — गजस्य आननमिव आननं यस्य सः।

07

अव्ययीभाव समास किसे कहते हैं?

जिस समास में पूर्वपद का अर्थ प्रधान हो और पूरा समस्त पद अव्यय बन जाए। जैसे उपग्रामम् (नगरस्य समीपे), निर्मशकम् (मशकानाम् अभावः), प्रतिदिनम् (दिने दिने)। इसके प्रायः ३३ भेद हैं।

08

कर्मधारय समास कितने प्रकार का होता है?

कर्मधारय (तत्पुरुष का भेद) नवधा है — विशेषणपूर्वपद (नीलमेघः), विशेषणोत्तरपद (वैयाकरणखसूचिः), विशेषणोभयपद (शीतोष्णम्), उपमानपूर्वपद (मेघश्यामः), उपमानोत्तरपद (नरव्याघ्रः), अवधारणापूर्वपद (विद्याधनम्), सम्भावनापूर्वपद (आम्रवृक्षः), मध्यमपदलोप (शाकपार्थिवः), मयूरव्यंसकादि (देशान्तरम्)।

09

द्विगु समास क्या है?

द्विगु समास तत्पुरुष का ही भेद है जिसका पूर्वपद संख्यावाची हो। यह तीन प्रकार का है — समाहारद्विगु (त्रिलोकम्), तद्धितार्थद्विगु (षाण्मातुरः), उत्तरपदद्विगु (पञ्चगवधनः)।

10

Sharda Class 9 Samas PDF में कौन-से भेद पढ़ाए जाते हैं?

शारदा कक्षा ९ के परिशिष्ट २ में तत्पुरुष (विभक्ति/कर्मधारय/द्विगु/नञ्-प्रभृति), द्वन्द्व (इतरेतर/समाहार), बहुव्रीहि (सामान्य षोढा + विशेष नवधा) और अव्ययीभाव (प्रायः ३३ भेद) — ये सभी समास-भेद व उनके उदाहरण सचित्र तालिकाओं में दिए गए हैं।

11

समास में पूर्वपद और उत्तरपद क्या होते हैं?

समास में पहले आने वाला पद पूर्वपद और बाद में आने वाला पद उत्तरपद कहलाता है। जैसे 'सीतापतिः' में 'सीता' पूर्वपद और 'पतिः' उत्तरपद है।

12

नञ्-तत्पुरुष समास के उदाहरण कौन-से हैं?

स्रोत के अनुसार नञ्-प्रभृति के पाँच भेद हैं — नञ् (अधर्मः), कु (कुपुत्रः), गति (शुक्लीकृत्य), प्रादि (प्राचार्यः, अतिदेवः, निर्वाराणसिः), उपपद (कुम्भकारः)।

13

किस समास में अन्य पद का अर्थ प्रधान होता है?

बहुव्रीहिसमास में दोनों पदों का अर्थ गौण होकर किसी अन्य पद का (बाह्य) अर्थ प्रधान होता है। जैसे पीताम्बरः — पीत + अम्बर किसी और (विष्णु) को इंगित करते हैं।

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