Summary
परिशिष्ट 3 — Class 9 Sanskrit NCERT textbook (Sharda), 'Vachyam' — वाच्य (प्रयोग) क्रिया के तीन प्रकार हैं: कर्तृवाच्य (कर्तरि प्रयोग), कर्मवाच्य (कर्मणि प्रयोग) और भाववाच्य (भावे प्रयोग); इनमें क्रियापद क्रमशः कर्ता, कर्म और भाव के अनुसार चलता है।
- कर्तृवाच्य (कर्तरि प्रयोग) — कर्तरि प्रयोग में कर्तृवाचक पद प्रथमाविभक्ति में, कर्मवाचक पद द्वितीयाविभक्ति में, और क्रियापद कर्तृपद के अनुसार (वचन, पुरुष) होता है। कर्मपद के वचन-परिवर्तन से क्रियापद में कोई परिवर्तन नहीं होता। उदाहरण: बालः चित्रं पश्यति। बालौ चित्रं पश्यतः। बालाः चित्रं पश्यन्ति। पुरुष-व्यवस्था: मध्यमपुरुष — त्वं/युवां/यूयम् (यथा: त्वं श्लोकं पठसि); उत्तमपुरुष — अहम्/आवां/वयम् (यथा: अहं श्लोकं पठामि); प्रथमपुरुष — अन्य सभी (यथा: सः श्लोकं पठति)।
- कर्मवाच्य (कर्मणि प्रयोग) — कर्मणि प्रयोग में कर्तृपद तृतीयाविभक्ति में, कर्मपद प्रथमाविभक्ति में होता है और क्रियापद कर्मपद का अनुसरण करता है। धातु से 'यक्' (य) प्रत्यय जोड़कर आत्मनेपदी रूप बनते हैं — वर्तमानकाल में 'ति' के स्थान पर 'ते' होता है। उदाहरण: गम् + य + ते = गम्यते; पठ् + य + ते = पठ्यते; लिख् + य + ते = लिख्यते। कर्तरि-कर्मणि तुलना: पठति → पठ्यते; लिखति → लिख्यते; खादति → खाद्यते; गच्छति → गम्यते; करोति → क्रियते; पश्यति → दृश्यते। वाक्य-उदाहरण: बालकः श्लोकं पठति → बालकेन श्लोकः पठ्यते। राधा पूजां करोति → राधया पूजा क्रियते।
- भाववाच्य (भावे प्रयोग) — भावे प्रयोग अकर्मक धातुओं (जिनका कर्म नहीं होता) के साथ ही होता है; इनका कर्मणि प्रयोग नहीं होता। क्रियापद के रूप कर्मणि प्रयोग के समान होते हैं, परन्तु क्रियापद सर्वदा प्रथमपुरुष एकवचन में ही रहता है। उदाहरण: हस् + यक् + ते = हस्यते। वाक्य: ते हसन्ति → तैः हस्यते; बालाः उद्याने क्रीडन्ति → बालैः उद्याने क्रीड्यते; सा उत्तिष्ठति → तया उत्थीयते। कृदन्त में भावे प्रयोग होने पर क्त/तव्यत्/अनीयर् प्रत्ययान्त रूप सदैव नपुंसकलिंग प्रथमाविभक्ति एकवचन में रहते हैं। अकर्मक धातुओं के उदाहरण: क्रीडति, भवति, शोभते, विकसति, उपविशति, वर्धते, नश्यति।
- भूतकाल एवं विधिलिंग में वाच्य-प्रयोग — भूतकाल में कर्तरि प्रयोग के लिए 'क्तवतु' प्रत्यय और कर्मणि/भावे प्रयोग के लिए 'क्त' प्रत्यय का प्रयोग होता है। उदाहरण — कर्तरि: बालकः श्लोकं पठितवान्; कर्मणि: बालकेन श्लोकः पठितः। विधिलिंग में कर्तरि प्रयोग के अर्थ में 'तव्यत्' और 'अनीयर्' प्रत्ययों का प्रयोग होता है; ये प्रत्यय कर्मपद के लिंग और वचन के अनुसार होते हैं। उदाहरण: महेशः आपणं गच्छेत् → महेशेन आपणः गन्तव्यः / गमनीयः; छात्राः स्वाध्यायं कुर्युः → छात्रैः स्वाध्यायः कर्तव्यः / करणीयः; सः भगवद्गीता पठेत् → तेन भगवद्गीता पठितव्या / पठनीया।
Key points & formulas
- 01वाच्य के तीन प्रकार — कर्तृवाच्य (कर्तरि प्रयोग), कर्मवाच्य (कर्मणि प्रयोग), भाववाच्य (भावे प्रयोग)
- 02कर्तृवाच्य — कर्ता प्रथमाविभक्ति में, कर्म द्वितीयाविभक्ति में; क्रियापद कर्ता के वचन व पुरुष का अनुसरण करता है
- 03कर्मवाच्य — कर्ता तृतीयाविभक्ति में, कर्म प्रथमाविभक्ति में; यक्-प्रत्यय + आत्मनेपद; 'ति' → 'ते'
- 04उदाहरण कर्मवाच्य — बालकेन श्लोकः पठ्यते; राधया पूजा क्रियते; मया इक्षुरसः पीयते
- 05भाववाच्य — केवल अकर्मक धातुओं से; क्रियापद सदा प्रथमपुरुष एकवचन; कर्मणि प्रयोग नहीं होता
- 06उदाहरण भाववाच्य — तैः हस्यते; बालैः उद्याने क्रीड्यते; तया उत्थीयते
- 07भूतकाल — कर्तरि में क्तवतु प्रत्यय, कर्मणि/भावे में क्त प्रत्यय
- 08विधिलिंग — तव्यत्/अनीयर् प्रत्यय; कर्मपद के लिंग-वचन के अनुसार; उदाहरण: गन्तव्यः/गमनीयः, कर्तव्यः/करणीयः
- 09कर्तरि-कर्मणि रूप-तालिका — पठति/पठ्यते; लिखति/लिख्यते; करोति/क्रियते; पश्यति/दृश्यते; गच्छति/गम्यते
Frequently asked questions
01वाच्य (Vachya) किसे कहते हैं?
वाच्य को संस्कृत में 'प्रयोग' भी कहते हैं। यह क्रियापद के उस रूप को कहते हैं जो यह बताता है कि वाक्य में कर्ता, कर्म या भाव में से कौन प्रधान है। शारदा (Class 9) के परिशिष्ट ३ के अनुसार इसके तीन प्रकार हैं: कर्तरि प्रयोग, कर्मणि प्रयोग और भावे प्रयोग।
02वाच्य के कितने प्रकार हैं?
वाच्य के तीन प्रकार हैं — (१) कर्तृवाच्य (कर्तरि प्रयोग), (२) कर्मवाच्य (कर्मणि प्रयोग), (३) भाववाच्य (भावे प्रयोग)।
03कर्तृवाच्य और कर्मवाच्य में क्या अंतर है?
कर्तृवाच्य में कर्ता प्रथमाविभक्ति में होता है और क्रियापद कर्ता का अनुसरण करता है। कर्मवाच्य में कर्ता तृतीयाविभक्ति में और कर्म प्रथमाविभक्ति में होता है; क्रियापद कर्म का अनुसरण करता है और धातु में यक्-प्रत्यय जुड़ता है।
04कर्मवाच्य के उदाहरण क्या हैं?
कर्मवाच्य के उदाहरण: बालकेन श्लोकः पठ्यते; राधया पूजा क्रियते; मया इक्षुरसः पीयते; आरक्षकैः चोराः नीयन्ते; सञ्जयेन लेखन्यः दीयन्ते; मित्रैः चलच्चित्रं दृश्यते।
05भाववाच्य कब प्रयोग होता है?
भाववाच्य केवल अकर्मक धातुओं (जिनका कोई कर्म नहीं होता) के साथ होता है। इसमें क्रियापद सदैव प्रथमपुरुष एकवचन में रहता है। उदाहरण: तैः हस्यते; बालैः उद्याने क्रीड्यते; शिशुना शय्यते।
06कर्मणि प्रयोग में यक्-प्रत्यय कैसे लगता है?
कर्मणि प्रयोग में धातु के बाद 'यक्' (य) प्रत्यय जोड़ा जाता है, फिर आत्मनेपद प्रत्यय लगता है। वर्तमानकाल में 'ति' के स्थान पर 'ते' आता है। जैसे: पठ् + य + ते = पठ्यते; गम् + य + ते = गम्यते; लिख् + य + ते = लिख्यते।
07भूतकाल में कर्मवाच्य कैसे बनाते हैं?
भूतकाल में कर्मणि प्रयोग के लिए 'क्त' प्रत्यय का प्रयोग होता है। कर्तरि में 'क्तवतु' लगता है। उदाहरण — कर्तरि: बालकः श्लोकं पठितवान्; कर्मणि: बालकेन श्लोकः पठितः। तया कविता लिखिता। सुनीतया फलानि खादितानि।
08तव्यत् और अनीयर् प्रत्ययों का प्रयोग कब होता है?
विधिलिंग के अर्थ में (चाहिए/करना चाहिए) कर्मणि प्रयोग में 'तव्यत्' और 'अनीयर्' प्रत्यय लगते हैं। ये कर्मपद के लिंग और वचन के अनुसार बदलते हैं। उदाहरण: महेशेन आपणः गन्तव्यः / गमनीयः; छात्रैः स्वाध्यायः कर्तव्यः / करणीयः; तेन भगवद्गीता पठितव्या / पठनीया।
09भावे प्रयोग में क्रियापद हमेशा एकवचन क्यों रहता है?
भावे प्रयोग में भाव (क्रिया का होना) प्रधान होता है, न कर्ता और न कर्म। इसीलिए क्रियापद कर्ता या कर्म के वचन-लिंग का अनुसरण नहीं करता; यह सदैव प्रथमपुरुष एकवचन में रहता है। उदाहरण: नर्तकाः नृत्यन्ति → नर्तकैः नृत्यते (एकवचन, भले ही नर्तक बहुवचन हों)।
10Sharda Class 9 Vachya PDF में कौन-कौन से अभ्यास हैं?
शारदा कक्षा ९ के परिशिष्ट ३ (वाच्यम्) में वर्तमानकाल, भूतकाल और विधिलिंग-लकार — तीनों में कर्तरि, कर्मणि और भावे प्रयोगों के उदाहरण-वाक्य दिए गए हैं। साथ ही अकर्मक धातुओं की सूची और कर्तरि-कर्मणि रूप-तालिका भी इस परिशिष्ट में है।
11कर्तरि प्रयोग में पुरुष-व्यवस्था क्या होती है?
कर्तरि प्रयोग में तीन पुरुष होते हैं — (१) मध्यमपुरुष: कर्तृपद त्वं/युवां/यूयं हो तो क्रियापद मध्यमपुरुष में (यथा: त्वं श्लोकं पठसि); (२) उत्तमपुरुष: अहम्/आवां/वयम् हो तो उत्तमपुरुष में (यथा: अहं श्लोकं पठामि); (३) प्रथमपुरुष: अन्य सभी कर्तृपद (यथा: सः श्लोकं पठति)।
12अकर्मक धातु कौन-कौन सी हैं जो भावे प्रयोग में आती हैं?
शारदा परिशिष्ट ३ में दी गई अकर्मक धातुओं में से कुछ: क्रीडति, भवति, शोभते, मोदते, वर्तते, कम्पते, विकसति, उपविशति, विश्वसिति, नश्यति, गर्जति, लज्जते, प्लवते, वर्धते, त्वरते।
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