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Class 9 Sanskrit

Chapter 10 — णमो अरिहन्ताणम्

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Overview

Summary

पाठ 10 — Class 9 Sanskrit NCERT textbook (Sharda), 'Namo Arihantanam' — यह पाठ जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ) के जीवन और जैनों के परम मन्त्र णमोकारमन्त्र (जो प्राकृत भाषा में है) का परिचय देता है।

  • ऋषभदेव — राजा से आदिनाथ तकराजा नाभि और मरुदेवी के पुत्र ऋषभ ने दुर्भिक्ष-काल में राज्य सँभाला। उन्होंने कृषि, वस्त्रनिर्माण, पशुपालन, गृहनिर्माण और नगरनिर्माण जैसे जीवन-कौशल प्रशिक्षित किए, जिससे 'विनिता' नगर की स्थापना हुई। एक नर्तकी की अचानक मृत्यु देखकर उनका मन वैराग्य की ओर मुड़ा। उन्होंने साम्राज्य पुत्रों को बाँट दिया (विनिता → भरत, तक्षशिला → बाहुबलि) और भिक्षु-जीवन अपनाया। फाल्गुन-कृष्ण एकादशी को प्रयागराज में अक्षयवटवृक्ष के नीचे केवलज्ञान प्राप्त कर वे 'आदिनाथ' — जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर — कहलाए।
  • णमोकारमन्त्र — जैनों का परम मन्त्र (प्राकृत भाषा)पाठ में दिया गया नवकारमन्त्र (णमोकारमन्त्र) प्राकृत भाषा में है: 'णमो अरिहन्ताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।' इसका अर्थ है — अरिहन्तों को, सिद्धों को, आचार्यों को, उपाध्यायों को और लोक के सब साधुओं को नमस्कार। यह मन्त्र पञ्चपरमेष्ठियों को प्रणाम समर्पित करता है। प्रतिवर्ष अप्रैल माह की नवमी तिथि को 'नवकारमहामन्त्रदिवस' के रूप में मनाया जाता है।
  • जैनधर्म के प्रमुख सिद्धान्त और त्रिरत्नपाठ के अनुसार जैनमत के प्रमुख सिद्धान्त हैं — अहिंसा परमो धर्मः (मन, वचन, कर्म से अहिंसा), अनेकान्तवाद (सत्य के अनेक पक्ष होते हैं), स्याद्वाद (प्रत्येक वचन सापेक्ष है) और अपरिग्रह (आवश्यकता से अधिक संग्रह नहीं करना)। त्रिरत्न के रूप में सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र उल्लिखित हैं। पञ्चमहाव्रतों में सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य बताए गए हैं।
  • प्राकृत भाषा और संस्कृत का सम्बन्धपाठ में 'अत्र इदम् अवधेयम्' (जानने योग्य) खण्ड में बताया गया है कि भारत में अनेक प्राकृत भाषाएँ सामान्य जन-संवाद में थीं — आर्षप्राकृत, मागधी, शौरसेनी, महाराष्ट्री, पैशाची, चूलिका और अपभ्रंश। जैनागम अर्धमागधी में लिखे गए। महाकवि हाल ने महाराष्ट्री प्राकृत में 'गाथासप्तशती' की रचना की। पाठ में कहा गया है: 'संस्कृतं यदि स्रोतस्विनी नदी, तर्हि प्राकृतं तस्या एव सरलः प्रवाहः अस्ति।'
Essentials

Key points & formulas

  1. 01विधा — जैन-परम्परा पर आधारित गद्यात्मक पाठ (Sanskrit prose + Prakrit mantra); शारदा कक्षा ९, पाठ १०
  2. 02केंद्रीय भाव — ऋषभदेव के राजनीतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक जीवन के माध्यम से जैनधर्म के मूल्यों — अहिंसा, अपरिग्रह, सेवा — का प्रतिपादन
  3. 03प्रमुख गाथा/श्लोक — 'णमो अरिहन्ताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं' (भावार्थ — पञ्चपरमेष्ठियों — अरिहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और सर्वसाधु — को नमस्कार; यह जैनों का परमपावन प्राकृत मन्त्र है)
  4. 04प्रमुख श्लोक — 'प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्। नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्॥' (भावार्थ — राजा का सुख प्रजा के सुख में है, अपनी प्रिय वस्तु नहीं बल्कि प्रजा का हित ही राजा का हित है)
  5. 05प्रमुख श्लोक — 'दैवाधीनं जगत्सर्वं जन्मकर्मशुभावहम्। संयोगश्च वियोगश्च न च दैवात्परं बलम्॥' (भावार्थ — समस्त जगत् दैव के अधीन है; संयोग-वियोग सब भाग्य से होते हैं)
  6. 06शब्दार्थ — णमो = नमामि/नमस्कार; अरिहन्ताणं = अरिहन्तृन् (शत्रु-विजेता); केवलज्ञानम् = कैवल्य का ज्ञान; दुर्भिक्षम् = अकाल; निराहारम् = भोजनरहित; अपरिग्रहः = आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना; नवकारमन्त्रः = जैन प्रार्थना मन्त्र
Questions

Frequently asked questions

01

Namo Arihantanam summary in Hindi (Class 9 Sanskrit Sharda Chapter 10)

यह पाठ जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के जीवन पर आधारित है। उन्होंने राजा के रूप में दुर्भिक्ष-संकट में जनों को कृषि, वस्त्रनिर्माण आदि जीवन-कौशल सिखाए और 'विनिता' नगर बसाया। एक नर्तकी की अचानक मृत्यु से वैराग्य उत्पन्न हुआ, उन्होंने साम्राज्य त्यागकर भिक्षु-जीवन अपनाया। ४०० दिन के उपवास के बाद प्रपौत्र श्रेयांस ने उन्हें इक्षुरस दिया (अक्षयतृतीया)। प्रयागराज में केवलज्ञान प्राप्त कर वे 'आदिनाथ' कहलाए। पाठ में णमोकारमन्त्र (प्राकृत भाषा में), जैनधर्म के सिद्धान्त और २४ तीर्थंकरों की सूची भी दी गई है।

02

Sharda Class 9 Chapter 10 PDF कहाँ मिलेगा?

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03

णमोकारमन्त्र क्या है और यह किस भाषा में है?

पाठ के अनुसार णमोकारमन्त्र (नवकारमन्त्र) जैनों का परमपावन मन्त्र है जो प्राकृत भाषा में है। यह पञ्चपरमेष्ठियों — अरिहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और लोक के सर्वसाधु — को नमस्कार करता है।

04

ऋषभदेव को 'आदिनाथ' क्यों कहते हैं?

पाठ के अनुसार ऋषभदेव ने फाल्गुन-कृष्ण एकादशी को प्रयागराज में अक्षयवटवृक्ष के नीचे केवलज्ञान प्राप्त किया। वे जैनसम्प्रदाय के प्रथम (आदिम) तीर्थंकर हैं, इसलिए 'आदिनाथ' कहलाए।

05

ऋषभदेव के ४०० दिन के उपवास का अन्त कैसे हुआ?

पाठ के अनुसार ऋषभदेव हस्तिनापुर के निकट इक्षुक्षेत्र से गुजर रहे थे, जो उनके प्रपौत्र श्रेयांस का था। श्रेयांस ने प्रपितामह को इक्षुरस (गन्ने का रस) पिलाया, जिससे उनका दीर्घकालिक उपवास समाप्त हुआ। वह दिन वैशाख-शुक्ल अक्षयतृतीया था, जो अब जैन 'वर्षतपपारणामहोत्सव' के रूप में मनाया जाता है।

06

जैनधर्म के त्रिरत्न कौन-से हैं?

पाठ में तीन रत्न बताए गए हैं — सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र।

07

पञ्चमहाव्रत कौन-से हैं?

पाठ के अनुसार पञ्चमहाव्रत हैं — सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।

08

ऋषभदेव ने प्रजा को कौन-से जीवन-कौशल सिखाए?

पाठ के अनुसार ऋषभदेव ने कृषिकार्य, विविध भोजन-निर्माण, तन्तुओं से वस्त्र-निर्माण, पशुपालन (गाय-घोड़े आदि), काष्ठ-धातु-शिला से गृहोपयोगी वस्तुएँ बनाना, पत्र-निर्माण, गृह-निर्माण और नगर-निर्माण सिखाए।

09

संस्कृत और प्राकृत भाषा का क्या सम्बन्ध है? (पाठ के अनुसार)

पाठ में लिखा है: 'संस्कृतं यदि स्रोतस्विनी नदी, तर्हि प्राकृतं तस्या एव सरलः प्रवाहः अस्ति।' अर्थात् संस्कृत यदि उद्गम-स्रोत वाली नदी है तो प्राकृत उसी का सरल प्रवाह है; दोनों में अविच्छिन्न सम्बन्ध है।

10

'प्रजासुखे सुखं राज्ञः' श्लोक का अर्थ क्या है?

पाठ में यह श्लोक ऋषभदेव के राज्य-दर्शन को व्यक्त करता है — 'राजा का सुख प्रजा के सुख में है, राजा का हित प्रजा के हित में है; राजा का अपना प्रिय हित नहीं, बल्कि प्रजा का प्रिय हित ही असली हित है।'

11

जैन जगत् के प्रमुख तीर्थस्थल कौन-से हैं? (पाठ के अनुसार)

पाठ में उल्लिखित प्रमुख तीर्थस्थल हैं — सम्मेतशिखर (झारखण्ड), श्रवणबेलगोल (कर्नाटक), पावापुरी (बिहार), गिरनार (गुजरात), पालीताणा/शत्रुञ्जय (गुजरात), राजगृह (बिहार), अयोध्या (उत्तरप्रदेश), काशी (वाराणसी), चम्पापुर (बिहार), हस्तिनापुर (उत्तरप्रदेश), मिथिला (बिहार) और द्वारिका (गुजरात)।

12

जैनधर्म के २४वें तीर्थंकर कौन हैं?

पाठ के अनुसार महावीर (वर्धमान) जैनधर्म के २४वें तीर्थंकर हैं। वे वैशाली-कुण्डग्राम में जन्मे और पञ्चमहाव्रतों — अहिंसा, अपरिग्रह, संयम — का प्रचार किया।

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