Summary
पाठ 6 — Class 9 Sanskrit NCERT textbook (Sharda), 'Manahputam Samacharet' — इस पाठ में विभिन्न भारतीय ग्रन्थों (मनुस्मृति, भगवद्गीता, नीतिशतक आदि) से संकलित आठ सुभाषितों के माध्यम से यह शिक्षा दी गई है कि सभी कार्य पवित्र मन से करने चाहिए, क्योंकि मन मलिन होने पर कोई भी कार्य सम्यक् नहीं हो सकता।
- पाठ का केंद्रीय सन्देश — मनःपूतं समाचरेत् — पाठ का मूलभाव मनुस्मृति (६.४६) के श्लोक से लिया गया है: 'दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्। सत्यपूतां वदेत् वाचं मनः पूतं समाचरेत्॥' अर्थात् आँखों से देखकर पाँव रखें, वस्त्र से छानकर जल पीएँ, सत्य से शुद्ध वाणी बोलें और पवित्र मन से कार्य करें। पाठ की पूरी शिक्षा इसी सिद्धान्त पर आधारित है।
- सुभाषितों के स्रोत-ग्रन्थ — पाठ में आठ सुभाषित आठ भिन्न ग्रन्थों से संकलित हैं: (१) मनुस्मृति ६.४६, (२) मनुस्मृति ६.९२, (३) श्रीमद्भगवद्गीता ३.२१, (४) सुभाषितरत्नभाण्डागार, (५) नीतिशतक २७, (६) पञ्चतन्त्र मित्रभेद १४९, (७) मालविकाग्निमित्र १.२, (८) किरातार्जुनीय २.३०। यह पाठ भारतीय ज्ञान-परम्परा की विविधता का परिचय कराता है।
- धर्म के दश लक्षण (श्लोक २) — मनुस्मृति (६.९२) के अनुसार धर्म के दश लक्षण हैं: 'धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥' — धैर्य, क्षमा, आत्मसंयम (दम), चोरी न करना (अस्तेय), पवित्रता (शौच), इन्द्रियनिग्रह, बुद्धि (धी), विद्या, सत्य और अक्रोध — ये दश धर्म के लक्षण हैं।
- अभ्यास और पुरुषार्थ — तीन श्रेणियों का वर्णन — नीतिशतक (२७) का श्लोक तीन प्रकार के मनुष्यों का वर्णन करता है: नीच (अधम) विघ्न के भय से कार्य आरम्भ ही नहीं करते; मध्यम कार्य आरम्भ करके विघ्न आने पर रुक जाते हैं; उत्तम पुरुष विघ्नों से बार-बार टकराने पर भी आरम्भ किया कार्य कभी नहीं छोड़ते। पञ्चतन्त्र (मित्रभेद १४९) कहता है: उद्यमी पुरुषसिंह के पास लक्ष्मी स्वयं आती है।
Key points & formulas
- 01विधा — सुभाषित-संकलन (आठ श्लोक, आठ भिन्न भारतीय ग्रन्थों से)
- 02केंद्रीय भाव — सभी कार्य पवित्र मन (मनःपूत) से करने चाहिए; मन मलिन हो तो कार्य का फल भी दूषित होता है
- 03प्रमुख श्लोक — 'दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्। सत्यपूतां वदेत् वाचं मनः पूतं समाचरेत्॥' (भावार्थ — आँखों से देखकर पाँव रखें, वस्त्र से छानकर जल पीएँ, सत्यशुद्ध वाणी बोलें, पवित्र मन से कार्य करें)
- 04शब्दार्थ — गुणलुब्धाः = गुणों के अभिलाषी; दमः = इन्द्रियों और मन का नियन्त्रण; न्यसेत् = रखें (नि+अस्+विधि प्रपु.एव.); प्रतिहन्यमानाः = बार-बार बाधित होने पर भी; विमृश्यकारिणम् = विचार करके कार्य करने वाले को; परप्रत्ययनेयबुद्धिः = दूसरों के निर्देश से चलने वाली बुद्धि वाला
Frequently asked questions
01What is the Manahputam Samacharet summary (मनःपूतं समाचरेत् का सार)?
इस पाठ में आठ सुभाषित संकलित हैं जो यह सिखाते हैं कि मन पवित्र हो तो कार्य का फल भी शुभ होता है। पाठ का शीर्षक-वाक्य मनुस्मृति से है: 'मनः पूतं समाचरेत्' — अर्थात् पवित्र मन से कार्य करें। इसके साथ धर्म के दश लक्षण, श्रेष्ठ पुरुष के अनुकरण, अभ्यास का महत्त्व, उत्तम-मध्यम-अधम का भेद, लक्ष्मी और उद्यम, परीक्षण के बाद स्वीकृति, तथा विवेक के साथ कार्य करने का उपदेश दिया गया है।
02Sharda Class 9 Chapter 6 PDF कहाँ मिलेगा?
NCERT Sharda (शारदा) Class 9 Sanskrit Chapter 6 'मनःपूतं समाचरेत्' का PDF cbseprepmaster.com पर NCERT Books सेक्शन में उपलब्ध है। वहाँ Class 9 → Sanskrit → Sharda → Chapter 6 से सीधे PDF पढ़ या डाउनलोड कर सकते हैं।
03श्लोक १ का अन्वय क्या है (Shloka 1 Anvaya)?
दृष्टिपूतं पादं न्यसेत्, वस्त्रपूतं जलं पिबेत्, सत्यपूतां वाचं वदेत्, मनः पूतं समाचरेत्। — आँखों से देखकर पाँव रखें, कपड़े से छानकर जल पीएँ, सत्य से शुद्ध वाणी बोलें, और पवित्र मन से कार्य करें।
04धर्म के दश लक्षण कौन-से हैं (Dharma ke dash lakshan)?
मनुस्मृति (६.९२) के अनुसार: धृतिः (धैर्य), क्षमा, दमः (आत्मसंयम), अस्तेयम् (चोरी न करना), शौचम् (पवित्रता), इन्द्रियनिग्रहः, धीः (बुद्धि), विद्या, सत्यम्, अक्रोधः — ये दश धर्म के लक्षण हैं।
05उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः — इस श्लोक का भाव क्या है?
यह श्लोक पञ्चतन्त्र (मित्रभेद १४९) से है। इसका भाव है: लक्ष्मी उद्यमी पुरुषसिंह के पास स्वयं आती है। कायर (कापुरुष) कहते हैं कि सब भाग्य पर निर्भर है, किन्तु पुरुषार्थ से परिस्थिति को पार करके कार्य सिद्ध करो; यदि फिर भी सिद्धि न हो तो दोष नहीं।
06उत्तम-मध्यम-अधम का अन्तर (Uttam Madhyam Adham — Chapter 6 Sanskrit)?
नीतिशतक (२७) के अनुसार: अधम (नीच) विघ्न के भय से कार्य आरम्भ ही नहीं करते। मध्यम कार्य आरम्भ करके विघ्न आने पर छोड़ देते हैं। उत्तम पुरुष बार-बार विघ्नों से टकराने पर भी आरम्भ किया कार्य नहीं छोड़ते — 'प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति।'
07अभ्यास के महत्त्व पर श्लोक ४ का क्या सन्देश है?
सुभाषितरत्नभाण्डागार का यह श्लोक कहता है: 'अभ्यासेन क्रियाः सर्वाः अभ्यासात् सकलाः कलाः। अभ्यासाद् ध्यानमौनादि किमभ्यासस्य दुष्करम्॥' — सभी क्रियाएँ और कलाएँ अभ्यास से सिद्ध होती हैं, ध्यान-मौन भी अभ्यास से सिद्ध है; अभ्यास के लिए कुछ भी कठिन नहीं।
08पुराणमित्येव न साधु सर्वम् — श्लोक ७ का अर्थ क्या है?
यह श्लोक मालविकाग्निमित्र (१.२) से है: पुराना होने मात्र से कोई वस्तु अच्छी नहीं होती, न ही नई काव्यकृति दोषपूर्ण होती है। बुद्धिमान् (सन्तः) परीक्षण करके ही किसी को स्वीकार करते हैं; मूर्ख (मूढः) दूसरों के निर्देश (परप्रत्यय) पर चलता है।
09सहसा विदधीत न क्रियाम् — इसका अर्थ और सन्देश?
किरातार्जुनीय (२.३०) का यह श्लोक कहता है: बिना विचारे कार्य न करें, क्योंकि अविवेक ही विपत्तियों का सबसे बड़ा द्वार है। गुणों के अभिलाषी (गुणलुब्धाः) सम्पदाएँ विचारपूर्वक कार्य करने वाले (विमृश्यकारिणम्) के पास स्वयं आती हैं।
10यद्यदाचरति श्रेष्ठः — भगवद्गीता का यह श्लोक पाठ में क्यों लिया गया है?
श्रीमद्भगवद्गीता (३.२१) का यह श्लोक पाठ में यह बताने के लिए है कि श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, साधारण लोग उसी का अनुसरण करते हैं। इसलिए श्रेष्ठ व्यक्ति का उत्तरदायित्व और भी अधिक होता है कि वह पवित्र मन से कार्य करे।
11पाठ में कौन-कौन से ग्रन्थों से श्लोक लिए गए हैं?
मनुस्मृति (२ श्लोक: ६.४६ और ६.९२), श्रीमद्भगवद्गीता (३.२१), सुभाषितरत्नभाण्डागार, नीतिशतक (२७), पञ्चतन्त्र-मित्रभेद (१४९), मालविकाग्निमित्र (१.२), और किरातार्जुनीय (२.३०) — कुल आठ श्लोक, आठ ग्रन्थों से।
12Class 9 Sharda Chapter 6 के अभ्यास में कौन-से प्रकार के प्रश्न हैं?
अभ्यास में पूर्णवाक्य में उत्तर, रिक्तस्थान, श्लोकांश से प्रश्न-निर्माण, श्लोक पढ़कर उत्तर, मञ्जूषा से भावार्थ पूरण, अन्वय पूरण, श्लोक-स्रोत मेलन, सन्धिविच्छेद, तथा समास-विग्रह — ये प्रकार के प्रश्न दिए गए हैं।
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