SanskritClass 9

Sharda (शारदा)

2026-27 Edition16 Chapters

Chapter notes

What you'll learn in Sharda (शारदा)

A quick revision map of Sharda (शारदा) — the core idea and five key takeaways from each chapter. Tap any chapter to read the full NCERT PDF and detailed notes.

01

सत्यं शिवं सुन्दरं संस्कृतम्

पाठ 1 — Class 9 Sanskrit NCERT textbook (Sharda), 'Satyam Shivam Sundaram Sanskritam' — यह एक गीत है जिसमें कवि पण्डित वासुदेव-शास्त्री द्विवेदी ने छः पदों में संस्कृत भाषा की महिमा का वर्णन किया है — भारतीय एकता, सद्गुण, विश्वबन्धुत्व, शान्ति और धर्म-काम-अर्थ-मोक्ष की प्राप्ति में संस्कृत की भूमिका।

  • 1विधा — गीत (कविना सुन्दरं गीतं प्रस्तुतम्‌ — स्रोत में स्पष्ट उल्लेख)
  • 2कवि परिचय — पण्डित वासुदेव-शास्त्री द्विवेदी; वाराणसी स्थित सार्वभौमसंस्कृतप्रचारकार्यालय के संस्थापक; सरल संस्कृत में अनेक ग्रन्थ रचे; परमार्थसुधा नामक संस्कृत पत्रिका के सम्पादक
  • 3केंद्रीय भाव — संस्कृत भाषा सत्य है, शिव है, और सुन्दर है — 'सत्यनिष्ठं शिवं सुन्दरं संस्कृतम्‌' (पद ५); संस्कृत से भारतीयैकता, मानस-परिष्कार, विश्वशान्ति और पुरुषार्थ-चतुष्टय सिद्ध होता है
  • 4संरचना — गीत में ६ पद हैं; प्रत्येक पद में ४ पंक्तियाँ हैं और हर पंक्ति 'संस्कृतम्‌' पर समाप्त होती है
  • 5प्रमुख श्लोक — 'धर्मकामार्थमोक्षप्रदं संस्कृतम्‌। ऐहिकामुष्मिकोत्कर्षदं संस्कृतम्‌। कर्मदं ज्ञानदं भक्तिदं संस्कृतम्‌। सत्यनिष्ठं शिवं सुन्दरं संस्कृतम्‌॥ ५॥' (भावार्थ — संस्कृत धर्म, काम, अर्थ और मोक्ष प्रदान करती है; इस लोक और परलोक में उन्नति देती है; कर्म, ज्ञान और भक्ति तीनों का मार्ग दिखाती है — इसीलिए यह सत्य, शिव और सुन्दर है)
02

सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलम् अर्थः

पाठ 2 — Class 9 Sanskrit NCERT textbook (Sharda), 'Sukhasya Mulam Dharmah' — यह पाठ कौटिल्य के अर्थशास्त्र के प्रसिद्ध सूत्र 'सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः' पर आधारित है, जो आर्थिक साक्षरता, न्यायपूर्ण धनोपार्जन, औचित्यपूर्ण व्यय तथा दीर्घकालीन सञ्चय के महत्त्व को जीवनमूल्यों से जोड़ता है।

  • 1विधा — गद्यपाठः (संस्कृत गद्य; भारतीय धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र एवं नीतिग्रन्थों के सूक्तियों पर आधारित)
  • 2केंद्रीय भाव — 'सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः' — न्यायपूर्वक अर्जित धन → धर्मपालन → दीर्घकालिक सुख; धर्म-अर्थ-सुख का अविच्छिन्न परस्परसम्बन्ध
  • 3प्रमुख श्लोक — 'जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। स क्रमः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥' (भावार्थ — जैसे जल की बूँद-बूँद से घड़ा भरता है, उसी प्रकार विद्या, धर्म और धन का संग्रह भी क्रमशः ही होता है; यह श्लोक चाणक्यनीति से उद्धृत है)
  • 4प्रमुख श्लोक — 'क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत्। क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम्॥' (भावार्थ — क्षण-क्षण में विद्या और कण-कण में धन अर्जित करना चाहिए; क्षण खो दें तो विद्या कहाँ, कण गँवा दें तो धन कहाँ)
  • 5प्रमुख श्लोक — 'ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय धर्ममर्थं च चिन्तयेत्।' (भावार्थ — दिन के आरम्भ में धर्म और अर्थ का चिन्तन करना चाहिए; यह गरुडपुराण से उद्धृत है)
03

आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः

पाठ 3 — Class 9 Sanskrit NCERT textbook (Sharda), 'Atmavat Sarvabhuteshu Yah Pashyati' — यह पाठ नामदेव महाराज की करुणामय घटना पर आधारित एक संवादात्मक कथा है, जो यह संदेश देती है कि जो सभी प्राणियों में अपने समान दुःख-सुख देखता है, वही सच्चा पण्डित है।

  • 1विधा — संवादात्मक गद्य-कथा (नाट्य-शैली); पात्र: मातामही, कपिल, माधवी, नामदेव (कथा में)
  • 2केंद्रीय भाव — सर्वभूतेषु समभाव और करुणा; जो ऐसा करता है वही पण्डित है
  • 3प्रमुख श्लोक — 'नैवेद्यं गृह्यतां देव भक्तिं मे ह्यचलां कुरु। ईप्सितं मे वरं देहि परत्र च परां गतिम्॥' (भावार्थ — हे देव! नैवेद्य स्वीकार करें, मुझे अचल भक्ति और अभीष्ट वर दें, तथा परलोक में उत्तम गति प्रदान करें)
  • 4शब्दार्थ — बुभुक्षितः = भूखा; पाषाणखण्डम् = पत्थर का टुकड़ा; लगुडम् = लकड़ी/लाठी; म्लाने = म्लान (उदास) मुख; पुण्यश्लोकः = जिसका चरित्र पवित्र हो वह; निकषा = समीप; अलम् = पर्याप्त/बस करो; परितः = चारों ओर; शुनकः = कुत्ता
  • 5पाण्डुरङ्ग — वारकरी सम्प्रदाय के आराध्य देव; पण्डरपुर (महाराष्ट्र, सोलापुरजनपद) में चन्द्रभागा-तट पर स्थित; विठोबा, विठ्ठल, पण्ठरीनाथ आदि नामों से भी जाने जाते हैं
04

न खलु वयस्तेजसो हेतुः

पाठ 4 — Class 9 Sanskrit NCERT textbook (Sharda), 'Na Khalu Vayastejaso Hetuh' — यह पाठ बालक्रान्तिवीर खुदीराम बोस की जीवनी पर आधारित गद्य रचना है, जो यह सिद्ध करती है कि वीरता और तेज के लिए अधिक आयु की आवश्यकता नहीं होती।

  • 1विधा — संस्कृत गद्य (जीवनी/चरित्र-लेखन); पुस्तक — शारदा, कक्षा ९
  • 2केंद्रीय भाव — वीरता और तेज के लिए अधिक आयु की आवश्यकता नहीं होती; खुदीराम ने मात्र अठारह वर्ष की आयु में देश के लिए प्राण अर्पित किए
  • 3प्रमुख श्लोक (उपदेश) — 'क्रान्तिकार्य कर्तुं शरीरं वज्रसदृशं, बुद्धिः असिधारा इव तीक्ष्णा, मनः गङ्गाजलमिव निर्मलं च भवेत् इति' (भावार्थ — क्रान्तिकार्य के लिए शरीर वज्र के समान दृढ़, बुद्धि तलवार की धार सी तीक्ष्ण, और मन गंगाजल सा निर्मल होना चाहिए)
  • 4शब्दार्थ — हुतात्मा : बलिदानी / देशार्थ प्राण-त्यागी; विस्फोटकम् : युद्धोपकरणविशेष (explosive); संत्रस्ताः : भयभीत; असाधारणः : अनन्यसाधारण / असामान्य (नञ्-तत्पुरुष समास); अधिवक्तृणाम् : अभिभाषकाणाम् (वकीलों का); प्रतीकारयत्नः : विरोध करने का प्रयास
  • 5प्रमुख तिथियाँ — जन्म : दिसम्बर १८८९; बङ्गभङ्ग : १९०५; बम-काण्ड : २८ अप्रैल १९०८; बलिदान : ११ अगस्त १९०८
05

एषा सा कृतकबुद्धिः मानवबुद्धेः सहकरी

पाठ 5 — Class 9 Sanskrit NCERT textbook (Sharda), 'Esha Sa Kritakabuddhih' — यह पाठ विद्यालय-कक्षा में अध्यापक और छात्रों के वार्तालाप के रूप में प्रस्तुत है, जिसमें कृत्रिम बुद्धि (कृतकबुद्धि) के स्वरूप, उपयोग-क्षेत्र, लाभ और सीमाओं पर चर्चा की गई है तथा यह स्पष्ट किया गया है कि कृतकबुद्धिः मानवबुद्धेः सहकरी अस्ति — वह मनुष्य की प्रतिस्पर्धिनी नहीं, सहायिका है।

  • 1विधा — वार्तालाप-पाठः (संवादात्मक गद्य); स्थान — विद्यालयकक्षा; पात्र — अध्यापक एवं छात्राः (यशिका, कात्यायनी, श्रेया, अथर्वः, वेदः, आकाशः, पावनी, अक्षतः, आर्यः, भास्करः, दीक्षा आदि)
  • 2केंद्रीय भाव — 'कृतकबुद्धिः मानवबुद्धेः सहकरी' — AI मानव का उपकरण है, प्रतिस्पर्धी नहीं; 'कृतकबुद्धिः गुरुमित्रम् अस्ति, गुरुविकल्पः नास्ति'; 'कृतकबुद्धिः मित्रं भवेत्, न भवेत् स्वामी'
  • 3प्रमुख श्लोकः — 'विदयुत्प्रज्ञया यन्त्राणि नित्यं वदन्ति चेतनाः। अहोरात्रं न विश्रान्ताः मानवान् धारयन्ति ते॥' (भावार्थ — विद्युत् बुद्धि से युक्त यन्त्र सदा सचेत रहते हैं, रात-दिन बिना विश्राम के मानवों को आधार देते हैं; यह श्लोक छात्र अथर्वः ने ChatGPT से प्राप्त किया, जो स्वयं AI की सर्जनात्मकता का उदाहरण है)
  • 4शब्दार्थ — कृतकबुद्धिः = AI (Artificial Intelligence); यन्त्राधिगमः = Machine Learning; गहनाधिगमः = Deep Learning; डटासेट् = यन्त्र-प्रशिक्षण हेतु दत्तांश-समूह; पूर्वग्रहः = Bias (पक्षपाती प्रशिक्षण-दोष); डीप-फेक् = कृतकबुद्ध्या निर्मितं मिथ्याचित्रम्; पटु-कारयानम् = self-driving car; रश्मिपरीक्षणविद्या = Radiology; मुखपरिचय-प्रणाली = Facial Recognition; चालकरहितम् = driverless
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मनःपूतं समाचरेत्

पाठ 6 — Class 9 Sanskrit NCERT textbook (Sharda), 'Manahputam Samacharet' — इस पाठ में विभिन्न भारतीय ग्रन्थों (मनुस्मृति, भगवद्गीता, नीतिशतक आदि) से संकलित आठ सुभाषितों के माध्यम से यह शिक्षा दी गई है कि सभी कार्य पवित्र मन से करने चाहिए, क्योंकि मन मलिन होने पर कोई भी कार्य सम्यक् नहीं हो सकता।

  • 1विधा — सुभाषित-संकलन (आठ श्लोक, आठ भिन्न भारतीय ग्रन्थों से)
  • 2केंद्रीय भाव — सभी कार्य पवित्र मन (मनःपूत) से करने चाहिए; मन मलिन हो तो कार्य का फल भी दूषित होता है
  • 3प्रमुख श्लोक — 'दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्। सत्यपूतां वदेत् वाचं मनः पूतं समाचरेत्॥' (भावार्थ — आँखों से देखकर पाँव रखें, वस्त्र से छानकर जल पीएँ, सत्यशुद्ध वाणी बोलें, पवित्र मन से कार्य करें)
  • 4शब्दार्थ — गुणलुब्धाः = गुणों के अभिलाषी; दमः = इन्द्रियों और मन का नियन्त्रण; न्यसेत् = रखें (नि+अस्+विधि प्रपु.एव.); प्रतिहन्यमानाः = बार-बार बाधित होने पर भी; विमृश्यकारिणम् = विचार करके कार्य करने वाले को; परप्रत्ययनेयबुद्धिः = दूसरों के निर्देश से चलने वाली बुद्धि वाला
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उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्

पाठ 7 — Class 9 Sanskrit NCERT textbook (Sharda), 'Upayam Chintayet Prajnastathapayam' — यह पाठ पञ्चतन्त्र के मित्रभेद तन्त्र से ली गई एक नीतिकथा है, जिसमें धर्मबुद्धि और पापबुद्धि नामक दो मित्रों की कहानी के माध्यम से यह नीति सिखाई जाती है कि बुद्धिमान व्यक्ति को उपाय के साथ-साथ आने वाले संकट का भी चिन्तन करना चाहिए।

  • 1विधा — पञ्चतन्त्र के मित्रभेद (प्रथम) तन्त्र से ली गई गद्य-पद्यमिश्रित नीतिकथा; ग्रन्थकार विष्णुशर्मा
  • 2केंद्रीय भाव — बुद्धिमान को उपाय के साथ अपाय का भी चिन्तन करना चाहिए; कुबुद्धि और छल का परिणाम विनाश होता है
  • 3प्रमुख श्लोक — 'उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्।' (भावार्थ — बुद्धिमान व्यक्ति कार्य के उपाय के साथ-साथ उससे होने वाले संकट का भी विचार करता है)
  • 4अन्य श्लोक — 'देशान्तरेषु बहुविधभाषावेषादि येन न ज्ञातम् / भ्रमता धरणीपीठे तस्य फलं जन्मनो व्यर्थम्॥' (भावार्थ — जो भूमि पर भ्रमण करके अनेक देशों की भाषा-वेश नहीं जानता, उसका जन्म व्यर्थ है)
  • 5अन्य श्लोक — 'मातृवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत् / आत्मवत्सर्वभूतेषु वीक्षन्ते धर्मबुद्धयः॥' (भावार्थ — धर्मात्मा लोग पराई स्त्री को माता, पराये धन को मिट्टी और सब प्राणियों को अपने समान देखते हैं)
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अन्नाद् आनन्दं प्रति

पाठ 8 — Class 9 Sanskrit NCERT textbook (Sharda), 'Annad Anandam Prati' — इस पाठ में तैत्तिरीयोपनिषद् पर आधारित भृगु-वरुण संवाद के माध्यम से पञ्चकोषों (अन्नमयकोष, प्राणमयकोष, मनोमयकोष, विज्ञानमयकोष, आनन्दमयकोष) का महत्त्व वर्णित है, जो अन्न से आरम्भ होकर आनन्द तक क्रमिक आत्मविकास का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

  • 1विधा — पितापुत्रसंवाद (तैत्तिरीयोपनिषद् पर आधारित); पाठ में भृगु-वरुण के संवाद के माध्यम से ज्ञान प्रस्तुत किया गया है।
  • 2केंद्रीय भाव — अन्नमयकोष से आरम्भ कर आनन्दमयकोष तक पञ्चकोषों का क्रमिक विकास ही मानव का समग्र विकास है; प्रत्येक कोष के विकास के लिए तप, अभ्यास और आहारशुद्धि आवश्यक है।
  • 3प्रमुख श्लोक — 'आहारात् सर्वभूतानि सम्भवन्ति महीपते। आहारेण विवर्धन्ते तेन जीवन्ति जन्तवः॥' (महाभारत, वनपर्व 131/7) — भावार्थ: सभी प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, आहार से ही शरीर का विकास और जीवन होता है।
  • 4प्रमुख श्लोक — 'आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः। स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः।' (छान्दोग्योपनिषद् 7/26/2) — भावार्थ: आहार की शुद्धि से सत्त्वशुद्धि, सत्त्वशुद्धि से दृढ़ स्मृति, और स्मृतिलाभ से समस्त ग्रन्थियों का मोक्ष होता है।
  • 5प्रमुख श्लोक — 'यावद् वायुः स्थितो देहे तावज्जीवनमुच्यते। मरणं तस्य निष्क्रान्तिस्ततो वायुं निरोधयेत्॥' (हठयोगप्रदीपिका) — भावार्थ: जब तक देह में वायु (प्राण) है तब तक जीवन है; इसलिए प्राणायाम द्वारा प्राणवायु की रक्षा करनी चाहिए।
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कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः

पाठ 9 — Class 9 Sanskrit NCERT textbook (Sharda), 'Kritam Pratikritam Bhuyadesha Dharmah' — यह पाठ महामहोपाध्यायेन श्रीरङ्गनाथशर्मणा विरचित संस्कृत रूपक 'एकचक्रम्' के तृतीय-चतुर्थ अंकों से उद्धृत है, जिसमें भीमसेन एकचक्रनगर के निवासियों की रक्षा हेतु बकासुर का वध करते हैं और यह सनातन धर्म स्थापित होता है कि उपकार का प्रत्युपकार करना मानव का शाश्वत कर्तव्य है।

  • 1विधा — संस्कृत रूपक (नाटक); महामहोपाध्यायेन श्रीरङ्गनाथशर्मणा विरचित 'एकचक्रम्' के तृतीय-चतुर्थ अंकों से उद्धृत
  • 2केंद्रीय भाव — उपकार का प्रत्युपकार करना सनातन धर्म है; क्षत्रिय का धर्म नररक्षण है, नरभक्षण नहीं
  • 3प्रमुख श्लोक — 'भक्षप्रदानेन चिरं परैरुपकृता वयम्। कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः ॥' (भावार्थ — नगरवासियों ने हमें भोजन देकर चिरकाल से उपकृत किया है; किया हुआ उपकार प्रत्युपकार में परिणत हो — यही शाश्वत धर्म है)
  • 4द्वितीय श्लोक — 'इमौ हि पीवरौ बाहू सहायौ सहजौ मम। बकं विध्वंसयिष्यामि सिंहः क्षुद्रमृगं यथा ॥' (भावार्थ — ये दोनों पुष्ट भुजाएँ मेरी सहज सहायक हैं; जैसे सिंह तुच्छ वन्यप्राणी को, वैसे ही मैं बक को नष्ट करूँगा)
  • 5शब्दार्थ — आयोधनम् = युद्धम्; असुरः = दैत्यः; विप्रः = ब्राह्मणः; हुताशनः = अग्निः; तनयः = पुत्रः; पीवरौ = पुष्टौ; पर्यायक्रमेण = बारी-बारी से; मृष्टान्नम् = स्वादिष्ट भोजन; बाढम् = हाँ (सहमति)
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णमो अरिहन्ताणम्

पाठ 10 — Class 9 Sanskrit NCERT textbook (Sharda), 'Namo Arihantanam' — यह पाठ जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ) के जीवन और जैनों के परम मन्त्र णमोकारमन्त्र (जो प्राकृत भाषा में है) का परिचय देता है।

  • 1विधा — जैन-परम्परा पर आधारित गद्यात्मक पाठ (Sanskrit prose + Prakrit mantra); शारदा कक्षा ९, पाठ १०
  • 2केंद्रीय भाव — ऋषभदेव के राजनीतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक जीवन के माध्यम से जैनधर्म के मूल्यों — अहिंसा, अपरिग्रह, सेवा — का प्रतिपादन
  • 3प्रमुख गाथा/श्लोक — 'णमो अरिहन्ताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं' (भावार्थ — पञ्चपरमेष्ठियों — अरिहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और सर्वसाधु — को नमस्कार; यह जैनों का परमपावन प्राकृत मन्त्र है)
  • 4प्रमुख श्लोक — 'प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्। नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्॥' (भावार्थ — राजा का सुख प्रजा के सुख में है, अपनी प्रिय वस्तु नहीं बल्कि प्रजा का हित ही राजा का हित है)
  • 5प्रमुख श्लोक — 'दैवाधीनं जगत्सर्वं जन्मकर्मशुभावहम्। संयोगश्च वियोगश्च न च दैवात्परं बलम्॥' (भावार्थ — समस्त जगत् दैव के अधीन है; संयोग-वियोग सब भाग्य से होते हैं)
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वर्णोच्चारण-शिक्षा २

पाठ ११ — Class 9 Sanskrit NCERT textbook (Sharda), 'वर्णोच्चारण-शिक्षा २' — यह पाठ संस्कृत वर्णों के शुद्ध उच्चारण के लिए आवश्यक आभ्यन्तर-प्रयत्न के पाँचों भेदों (स्पृष्ट, ईषत्-स्पृष्ट, ईषद्-विवृत, विवृत, संवृत) की विस्तृत शिक्षा देता है तथा स्वर-व्यञ्जन के वर्गीकरण एवं परस्पर-भेद को स्पष्ट करता है।

  • 1विषय — वर्णोच्चारण-शिक्षा २ : आभ्यन्तर-प्रयत्न के पाँच भेद
  • 2वर्ण-उत्पत्ति के तत्त्व — स्थानम्, करणम्, आभ्यन्तर-प्रयत्नः (तीनों आवश्यक)
  • 3आभ्यन्तर-प्रयत्न पञ्चविध — स्पृष्ट · ईषत्-स्पृष्ट · ईषद्-विवृत · विवृत · संवृत
  • 4स्पृष्ट-प्रयत्न → स्पर्श-व्यञ्जन (क/च/ट/त/प वर्ग, २५ वर्ण)
  • 5ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्न → अन्तःस्थ-व्यञ्जन (य, र, ल, व)
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परिशिष्टम् १: अन्वयः

परिशिष्ट 1 — Class 9 Sanskrit NCERT textbook (Sharda), 'Anvayah' — अन्वय का अर्थ है श्लोक के पदों का परस्पर सम्बन्ध जानकर उन्हें सरल गद्य क्रम में रखना; इसके लिए दण्डान्वय और खण्डान्वय — ये दो विधियाँ बतायी गयी हैं।

  • 1अन्वय — श्लोक के पदों का परस्पर सम्बन्ध जानकर उन्हें सरल गद्य-क्रम में रखना।
  • 2अन्वय की दो विधियाँ — दण्डान्वयविधिः और खण्डान्वयविधिः।
  • 3दण्डान्वय का क्रम — विशेषण → विशेष्य → (अव्यय/कृदन्त/तृतीयादि) → कर्तृपद → कर्मपद → क्रियापद।
  • 4अध्याहार — जो कर्तृपद या क्रियापद श्लोक में उपस्थित न हो, उसे विचारकर जोड़ना ('सुप्त पद')।
  • 5उदाहरण — 'शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खाः…' श्लोक में 'केचन', 'भवति' और 'यथा' अध्याहृत किए गए।
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परिशिष्टम् २: समासः

परिशिष्ट 2 — Class 9 Sanskrit NCERT textbook (Sharda), 'Samasah' — समास वह प्रक्रिया है जिसमें अर्थयुक्त दो या अधिक पद मिलकर एक पद बन जाते हैं; इसके चार मुख्य भेद हैं — तत्पुरुष, द्वन्द्व, बहुव्रीहि और अव्ययीभाव।

  • 1समास — परिभाषा: अर्थयुक्त अनेक पदों का एकीभवन (समसनं = सङ्क्षेपणम्)
  • 2पूर्वपद + उत्तरपद → प्रातिपदिक → समस्त पद + विभक्ति (यथा सीतापतिः)
  • 3विग्रहवाक्य — स्वपदविग्रह (कृष्णसखा → कृष्णस्य सखा) और अस्वपदविग्रह (यथामति → मतिम् अनतिक्रम्य)
  • 4समास के भेद — तत्पुरुष (उत्तरपदप्रधान), द्वन्द्व (उभयपदप्रधान), बहुव्रीहि (अन्यपदप्रधान), अव्ययीभाव (पूर्वपदप्रधान)
  • 5तत्पुरुष के उपभेद — विभक्तितत्पुरुष (षड्विध), कर्मधारय (नवधा), द्विगु (त्रिविध), नञ्-प्रभृति (पञ्चविध)
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परिशिष्टम् ३: वाच्यम्

परिशिष्ट 3 — Class 9 Sanskrit NCERT textbook (Sharda), 'Vachyam' — वाच्य (प्रयोग) क्रिया के तीन प्रकार हैं: कर्तृवाच्य (कर्तरि प्रयोग), कर्मवाच्य (कर्मणि प्रयोग) और भाववाच्य (भावे प्रयोग); इनमें क्रियापद क्रमशः कर्ता, कर्म और भाव के अनुसार चलता है।

  • 1वाच्य के तीन प्रकार — कर्तृवाच्य (कर्तरि प्रयोग), कर्मवाच्य (कर्मणि प्रयोग), भाववाच्य (भावे प्रयोग)
  • 2कर्तृवाच्य — कर्ता प्रथमाविभक्ति में, कर्म द्वितीयाविभक्ति में; क्रियापद कर्ता के वचन व पुरुष का अनुसरण करता है
  • 3कर्मवाच्य — कर्ता तृतीयाविभक्ति में, कर्म प्रथमाविभक्ति में; यक्-प्रत्यय + आत्मनेपद; 'ति' → 'ते'
  • 4उदाहरण कर्मवाच्य — बालकेन श्लोकः पठ्यते; राधया पूजा क्रियते; मया इक्षुरसः पीयते
  • 5भाववाच्य — केवल अकर्मक धातुओं से; क्रियापद सदा प्रथमपुरुष एकवचन; कर्मणि प्रयोग नहीं होता
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परिशिष्टम् ४: शब्दरूपाणि

परिशिष्ट 4 — Class 9 Sanskrit NCERT textbook (Sharda), 'Shabda-rupani' — यह परिशिष्ट संस्कृत के विविध शब्दों के रूप (सात विभक्ति × तीन वचन + सम्बोधन) की तालिकाएँ देता है, जिनमें पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग तीनों लिङ्गों के उदाहरण शामिल हैं।

  • 1शब्द रूप — 7 विभक्ति × 3 वचन + सम्बोधन = प्रत्येक शब्द के 24 रूप
  • 2पुंलिङ्ग शब्द — ब्रह्मन्, गुणिन्, पथिन्, विद्वस्, चन्द्रमस्, पुंस्, वेधस्, सुहृद्, वणिज्, भिषज्
  • 3स्त्रीलिङ्ग शब्द — वाच्, त्वच्, रुज्, स्रज्, सरित्, विद्युत्, दिव्, दिश्
  • 4नपुंसकलिङ्ग शब्द — जगत्, नामन्, कर्मन्, मनस्, पयस्, शिरस्, छन्दस्, चर्मन्, चक्षुस्
  • 5अन्तकारान्त वर्गीकरण — न्-कारान्त (ब्रह्मन्/नामन्), स्-कारान्त (विद्वस्/मनस्), त्-कारान्त (सरित्/जगत्), ज्-कारान्त (वणिज्/रुज्), च्-कारान्त (वाच्/त्वच्)
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परिशिष्टम् ५: धातुरूपाणि

परिशिष्ट 5 — Class 9 Sanskrit NCERT textbook (Sharda), 'Dhatu-rupani' — यह परिशिष्ट परस्मैपदी और आत्मनेपदी धातुओं के रूप पाँच लकारों (लट्, लृट्, लोट्, लङ्, विधिलिङ्) में, तीन पुरुष और तीन वचन के अनुसार, तालिका-रूप में प्रस्तुत करता है।

  • 1धातु रूप — लकार × 3 पुरुष × 3 वचन (9 रूप प्रति लकार)
  • 2परस्मैपदी धातु — पठ् (पढ़ना): लट्, लृट्, लोट्, लङ्, विधिलिङ् — पाँचों लकार
  • 3आत्मनेपदी धातु — वृध् (बढ़ना), लभ् (पाना), शीङ् (सोना), भुज् (खाना): पाँचों लकार
  • 4णिच्-प्रत्ययान्त प्रेरणार्थक रूप: पाठयति, लेखयति, गमयति आदि
  • 5परस्मैपदी लट्: प्रथम — पठति/पठतः/पठन्ति; मध्यम — पठसि/पठथः/पठथ; उत्तम — पठामि/पठावः/पठामः

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