Summary
'Prithivyam Treeni Ratnani' Class 6 Sanskrit (Deepakam) ka paath hai — इस अध्याय में चाणक्यनीति, रामायण, पञ्चतन्त्र आदि प्राचीन ग्रंथों से संकलित आठ नीतिपरक सुभाषित हैं, जो पृथ्वी के तीन रत्न (जल, अन्न, सुभाषित), परिश्रम की महिमा, उदार हृदय, विद्या का फल, और मातृभूमि की श्रेष्ठता सिखाते हैं।
यह अध्याय विभिन्न प्राचीन ग्रंथों — चाणक्यनीति, मनुस्मृति, पञ्चतन्त्र, हितोपदेश, रामायण और सुभाषितरत्नभाण्डागार — से लिए गए आठ सुभाषितों का संकलन है। पाठ बताता है कि पृथ्वी के असली रत्न जल, अन्न और सुभाषित हैं। उदार हृदय के लिए सारा संसार परिवार है। कार्य परिश्रम से सिद्ध होते हैं, इच्छा मात्र से नहीं। बड़ों की सेवा से आयु, विद्या, यश और बल बढ़ते हैं। विद्या से विनय, पात्रता, धन, धर्म और सुख मिलते हैं। राम के अनुसार जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ हैं।
Key points & formulas
- 01यह अध्याय आठ सुभाषितों का संग्रह है — ये चाणक्यनीति, मनुस्मृति, पञ्चतन्त्र, हितोपदेश, रामायण और सुभाषितरत्नभाण्डागार जैसे प्राचीन ग्रंथों से लिए गए हैं।
- 02पृथ्वी के तीन रत्न: जल, अन्न और सुभाषित हैं — मूढ़ (मूढैः) लोग पत्थर के टुकड़ों को रत्न कहते हैं।
- 03संकुचित मन के लोग 'यह मेरा — यह पराया' (निजः/परः) का भेद करते हैं; किन्तु उदार चरित्र वालों के लिए सारी पृथ्वी (वसुधा) ही परिवार है।
- 04कार्य परिश्रम (उद्यमेन) से सिद्ध होते हैं, केवल मनोरथ (इच्छा) से नहीं — जैसे सोए सिंह के मुख में मृग स्वयं नहीं जाते।
- 05जो प्रतिदिन बड़ों का अभिवादन करता है और उनकी सेवा करता है, उसके आयु, विद्या, यश और बल — ये चारों बढ़ते हैं।
- 06विद्या विनय देती है → विनय से पात्रता → पात्रता से धन → धन से धर्म → धर्म से सुख: यह श्रृंखला विद्या को जीवन की आधारशिला बताती है।
- 07श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा: सोने की लंका भी उन्हें नहीं भाती, क्योंकि जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बड़ी (गरीयसी) होती है।
Frequently asked questions
01Prithivyam Treeni Ratnani paath mein kya sikhaya gaya hai?
इस अध्याय में परिश्रम का महत्त्व, उदार हृदय से दुनिया को परिवार मानना, विद्या से सुख पाने की श्रृंखला, बड़ों की सेवा के लाभ, और मातृभूमि की श्रेष्ठता जैसे जीवन-मूल्य सुभाषितों के माध्यम से सिखाए गए हैं।
02Prithivyam Treeni Ratnani ka arth kya hai?
इसका अर्थ है 'पृथ्वी पर तीन रत्न'। इस अध्याय के अनुसार ये तीन रत्न हैं — जल (जलम्), अन्न (अन्नम्) और सुभाषित (श्रेष्ठ वचन)। मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों को रत्न समझते हैं।
03पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि — पृथ्वी के तीन रत्न कौन-से हैं?
इस अध्याय के पहले सुभाषित के अनुसार पृथ्वी के तीन रत्न हैं — जल, अन्न और सुभाषित। मूढ़ (अज्ञानी) लोग पाषाण-खण्डों को रत्न मानते हैं।
04'वसुधैव कुटुम्बकम्' का भाव इस अध्याय में कैसे समझाया गया है?
अध्याय के दूसरे सुभाषित में बताया गया है कि 'यह मेरा है, यह पराया है' — ऐसा भेद केवल संकुचित (लघुचेतसाम्) मन वाले करते हैं। उदार चरित्र वालों के लिए सारी पृथ्वी (वसुधा) ही परिवार है।
05उद्यम पर आधारित सुभाषित का क्या भाव है?
कार्य परिश्रम (उद्यमेन) से ही सिद्ध होते हैं, केवल मन की इच्छा से नहीं। जैसे सोए हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं नहीं जाते, उसी प्रकार बिना परिश्रम के कोई लक्ष्य नहीं मिलता।
06बड़ों की सेवा और अभिवादन से क्या लाभ होते हैं?
अध्याय के एक सुभाषित के अनुसार जो व्यक्ति प्रतिदिन वृद्धों का अभिवादन करता है और उनकी सेवा करता है, उसके आयु, विद्या, यश और बल — ये चारों बढ़ते हैं।
07इस अध्याय में विद्या के बारे में क्या बताया गया है?
दो सुभाषितों में विद्या की महिमा है। पहले में: विद्या → विनय → पात्रता → धन → धर्म → सुख की श्रृंखला बताई गई है। दूसरे में: केवल पुस्तक में रखी विद्या जरूरत के समय काम नहीं आती; व्यवहार में लाई गई विद्या ही असली विद्या है।
08'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी' — यह किसने कहा?
यह वचन इस अध्याय में रामायण से लिया गया है। श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा: सोने की लंका भी उन्हें नहीं भाती, क्योंकि जन्म देने वाली माता और जन्मभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ (गरीयसी) होती है।
09'पुस्तकस्था विद्या' वाले सुभाषित का क्या अर्थ है?
जो विद्या केवल पुस्तक में रखी रहे (पढ़ी न जाए) और जो धन दूसरे के हाथ में हो (परहस्तगतम्) — दोनों जरूरत के समय काम नहीं आते। इसलिए विद्या को पढ़कर व्यवहार में उतारना आवश्यक है।
10उद्यम, साहस, धैर्य वाले सुभाषित का भाव क्या है?
जिस व्यक्ति में परिश्रम (उद्यमः), साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम — ये छः गुण होते हैं, उसके कार्य में परमेश्वर भी सहायक (सहायकृत्) होते हैं।
11इस अध्याय के सुभाषित किन-किन प्राचीन ग्रंथों से लिए गए हैं?
अध्याय के योग्यता-विस्तर भाग में बताया गया है कि सुभाषित इन ग्रंथों से लिए गए हैं — चाणक्यनीति, मनुस्मृति, पञ्चतन्त्र, हितोपदेश, रामायण, और सुभाषितरत्नभाण्डागार।
12मूढैः का अर्थ क्या है?
मूढैः का अर्थ है 'मूर्ख जनों द्वारा'। इस अध्याय में यह शब्द उन लोगों के लिए प्रयुक्त है जो पत्थर के टुकड़ों को रत्न समझते हैं और जल, अन्न, सुभाषित के असली मूल्य को नहीं जानते।
13क्या Prithivyam Treeni Ratnani अध्याय की PDF मुफ़्त है?
हाँ, बिना साइन-अप के मुफ़्त डाउनलोड करें।
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