SanskritClass 6

Deepakam

Sanskrit Textbook16 Chapters

Chapter notes

What you'll learn in Deepakam

A quick revision map of Deepakam — the core idea and five key takeaways from each chapter. Tap any chapter to read the full NCERT PDF and detailed notes.

01

Vayam Varnamalam Pathaamah

'Vayam Varnamalam Pathaamah' Class 6 Sanskrit (Deepakam) ka pratham paath hai — इसमें संस्कृत वर्णमाला के स्वर, व्यंजन, मात्राएँ (गुणिताक्षर) और छः उच्चारण-स्थान (कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ, नासिका) सिखाए गए हैं।

  • 1स्वर दो प्रकार के होते हैं — समानाक्षर (ह्रस्व: अ, इ, उ, ऌ; दीर्घ: आ, ई, ऊ) और सन्ध्यक्षर (ए, ऐ, ओ, औ — जो दो स्वरों के मेल से बनते हैं)।
  • 2अनुनासिक स्वर वे होते हैं जो मुख और नासिका दोनों से एक साथ उच्चारित होते हैं, जैसे — अँ, आँ, इँ, ईँ, उँ, ऊँ आदि।
  • 3व्यंजनों के चार भेद — (१) स्पर्श (क, च, ट, त, प-वर्ग), (२) अन्तःस्थ (य, र, ल, व), (३) ऊष्म और (४) अयोगवाह (अं, अः)।
  • 4व्यंजन का उच्चारण बिना स्वर के नहीं होता; गुणिताक्षर (मात्रा-सारणी) में प्रत्येक व्यंजन को सभी स्वरों के साथ लिखना सिखाया गया है।
  • 5संस्कृत वर्णों के छः उच्चारण-स्थान — कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ और नासिका — पाणिनीय सूत्रों से समझाए गए हैं।
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Samyukta-Vyanjanani

'Samyukta-Vyanjanani' Class 6 Sanskrit (Deepakam) ka paath hai — इस पाठ में दो या अधिक व्यञ्जन-वर्णों के मेल से बनने वाले संयुक्त-व्यञ्जनों की पहचान, वर्ण-वियोग (शब्द को वर्णों में तोड़ना) और वर्ण-संयोग (वर्णों को जोड़कर शब्द बनाना) सिखाया गया है।

  • 1दो या अधिक व्यञ्जन-वर्णों के मेल से संयुक्त-व्यञ्जन बनते हैं — जैसे क् + ष् + अ = क्ष, त् + र् + अ = त्र।
  • 2पाठ में चार प्रमुख संयुक्त-व्यञ्जन विस्तार से सिखाए गए हैं: क्ष (कक्षा), त्र (पत्रम्), ज्ञ (ज्ञानम्), द्य (विद्या)।
  • 3संयुक्त-व्यञ्जन नवीन वर्ण नहीं हैं — ये पृथक्-पृथक् व्यञ्जन-वर्णों की विशिष्ट लेखन-शैली मात्र हैं।
  • 4वर्ण-वियोग अभ्यास: शब्दों को उनके मूल वर्णों में अलग करना — जैसे अजः = अ + ज् + अ + ः।
  • 5वर्ण-संयोग अभ्यास: वर्णों को जोड़कर शब्द पहचानना — जैसे द् + आ + श् + अ + र् + अ + थ् + इ + ः = दाशरथिः।
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Eshah Kah? Esha Ka? Etat Kim?

'Eshah Kah? Esha Ka? Etat Kim?' Class 6 Sanskrit (Deepakam) ka teesra paath hai — यह पाठ तीनों लिंगों (पुंलिंग, स्त्रीलिंग, नपुंसकलिंग) और तीनों वचनों (एकवचन, द्विवचन, बहुवचन) के सर्वनामों तथा क्रियापदों का परिचय देता है।

  • 1तीन लिंग सिखाए गए — पुंलिंग (बालकः, गजः), स्त्रीलिंग (बालिका, अजा), नपुंसकलिंग (फलम्, पुस्तकम्)
  • 2तीन वचन — एकवचन (एषः बालकः), द्विवचन (एतौ बालकौ), बहुवचन (एते बालकाः)
  • 3सर्वनाम: 'एषः/एषा/एतत्' (यह — निकट वस्तु के लिए) और 'सः/सा/तत्' (वह — दूर के लिए); प्रश्न के लिए 'कः/का/किम्'
  • 4क्रियापद परिचय — पठति/पठतः/पठन्ति, पिबति, खादति, गच्छति, क्रीडति (एकवचन, द्विवचन, बहुवचन रूप)
  • 5नए शब्द और अर्थ — लता (बेल), अजा (बकरी), सोपानम् (सीढ़ी), संगणकम् (संगणक/Computer), दूरदर्शनम् (दूरदर्शन/Television)
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Aham Cha Tvam Cha

'Aham Cha Tvam Cha' Class 6 Sanskrit (Deepakam) ka paath hai — इस पाठ में संस्कृत के उत्तम पुरुष (अहम्, आवाम्, वयम्) और मध्यम पुरुष (त्वम्, युवाम्, यूयम्) सर्वनाम, विभिन्न व्यवसायों के पुंलिंग-स्त्रीलिंग रूप तथा 'अस्' धातु के एकवचन, द्विवचन और बहुवचन में प्रयोग सिखाए गए हैं।

  • 1उत्तम पुरुष के सर्वनाम: अहम् (मैं), आवाम् (हम दोनों), वयम् (हम लोग)
  • 2मध्यम पुरुष के सर्वनाम: त्वम् (तुम), युवाम् (तुम दोनों), यूयम् (तुम लोग)
  • 3'अस्' धातु के रूप — मध्यम पुरुष: असि / स्थः / स्थ; उत्तम पुरुष: अस्मि / स्वः / स्मः
  • 4पुंलिंग और स्त्रीलिंग व्यवसाय-शब्द सिखाए गए: सैनिकः/सैनिकी, गायकः/गायिका, पत्रकारः/पत्रकारा, पाचकः/पाचिका, चित्रकारः
  • 5व्याकरण नियम: व्यंजन वर्ण से पूर्व पद के अंत के 'म्' के स्थान पर अनुस्वार (ं) लिखा जाता है — यथा 'पुस्तकं नास्ति'
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Sankhyaganana

'Sankhyaganana' Class 6 Sanskrit (Deepakam) ka paath hai — इस पाठ में संस्कृत में १ से ५० तक की संख्याओं के नाम (संख्यागणना) सिखाए गए हैं और शोकों, संख्यागीत तथा 'संख्याप्रसिद्धि' खंड के माध्यम से प्रत्येक संख्या का सांस्कृतिक महत्त्व भी बताया गया है।

  • 1पाठ में १ से ५० तक की संख्याओं के संस्कृत नाम सिखाए गए हैं — एकम्, द्वे, त्रीणि, चत्वारि, पञ्च, षट्, सप्त, अष्ट, नव, दश ... पञ्चाशत्।
  • 2शोकों के माध्यम से संख्याओं को उदाहरणों से जोड़ा गया है — सात वासर (सप्त वासराः), आठ दिग्गज (अष्ट दिग्गजाः), नौ ग्रह (नव ग्रहाः), दस दिशाएँ (दश दिशाः)।
  • 3'संख्याप्रसिद्धि' खंड में प्रत्येक संख्या (१-१०) का सांस्कृतिक महत्त्व बताया गया है — जैसे त्रीणि वचनानि, चत्वारि युगानि, षट् रसाः, सप्त ऋषयः, अष्ट दिक्पालाः।
  • 4दस दिशाओं (दश दिशाः) के संस्कृत नाम बताए गए हैं — पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ईशान, आग्नेय, नैर्ऋत्य, वायव्य, ऊर्ध्वम्, अधः।
  • 5'संख्यागीत' गतिविधि में जोड़ों में संख्याएँ बोलते हुए क्रिया करने का अभ्यास कराया गया है — एकं द्वे, त्रीणि चत्वारि, पञ्च षट् आदि।
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Aham Pratah Uttishthami

'Aham Pratah Uttishthami' Class 6 Sanskrit (Deepakam) ka paath hai — इस पाठ में संदीप और खुशी अपनी प्रातःकालीन दिनचर्या संस्कृत में बताते हैं और साथ में संस्कृत संख्याएँ (१-१२), घड़ी का समय (सपाद/सार्ध/पादोन) तथा शिष्टाचार के शब्द सिखाए जाते हैं।

  • 1पाठ में सुबह ५ बजे से ८ बजे तक की दिनचर्या संस्कृत में बताई गई है — उठना, भूमि-वंदना, उषःपान, योगासन, स्वाध्याय, स्नान, प्रार्थना, प्रातराश और विद्यालय जाना।
  • 2संस्कृत संख्याएँ सिखाई गई हैं: एकम् (१), द्वे (२), त्रीणि (३), चत्वारि (४), पञ्च (५), षट् (६), सप्त (७), अष्ट (८), नव (९), दश (१०), एकादश (११), द्वादश (१२)।
  • 3संस्कृत में समय बताने के विशेष शब्द सिखाए गए हैं — 'सपाद' (१५ मिनट अधिक), 'सार्ध' (३० मिनट अधिक), 'पादोन' (१५ मिनट कम)।
  • 4प्रमुख शब्दार्थ: उत्तिष्ठामि = जागता/जागती हूँ; उषःपानम् = सुबह गुनगुना जल पीना; दन्तधावनम् = दाँतों का मंजन; स्वाध्यायम् = स्वयं अध्ययन; प्रातराशम् = नाश्ता (अल्पाहार)।
  • 5पाठ के अभ्यास में शिष्टाचार के शब्द हैं — गुरुवन्दनम्, वृद्धसेवा, प्राणिषु दया, परोपकारः, सत्यकथनम्, स्वच्छता, समयपालनम्, अतिथिसत्कारः।
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Shooraah Vayam Dheeraah Vayam

'Shooraah Vayam Dheeraah Vayam' Class 6 Sanskrit (Deepakam) ka paath hai — यह श्रीधर भास्कर वर्णेकर द्वारा रचित एक देशभक्ति संस्कृत गीत है जिसमें घोषणा की गई है कि हम भारतीय शूरवीर, धीर, साहसी और गुणशाली हैं; साथ ही संस्कृत सर्वनाम (अस्मद्, युष्मद्, तद्, एतद्) एवं प्रथमा विभक्ति के एकवचन-द्विवचन-बहुवचन रूप भी सिखाए गए हैं।

  • 1यह पाठ संस्कृत का एक देशभक्ति गीत है जिसमें भारतीयों के वीरत्व, साहस, नीति और सेवाभाव का वर्णन है।
  • 2गीत के रचनाकार श्रीधर भास्कर वर्णेकर हैं — महाराष्ट्र के नागपुर से, प्रसिद्ध आधुनिक संस्कृत कवि, राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित।
  • 3गीत की प्रथम पंक्ति: 'शूरा वयं धीरा वयं वीरा वयं सुतराम् । गुणशालिनो बलशालिनो जयगामिनो नितराम् ॥'
  • 4मुख्य शब्द-अर्थ: दृढमानसाः = दृढ़ मन वाले; गतलालसाः = लोभरहित; ऊर्जस्वलाः = फुर्तीले; वर्चस्वलाः = तेजस्वी; गतभीतयः = भयरहित; समराङ्गणम् = युद्धक्षेत्र।
  • 5पाठ में प्रातिपदिक की अवधारणा और प्रथमा विभक्ति के रूप सिखाए गए हैं — अस्मद् (अहम्/आवाम्/वयम्), युष्मद् (त्वम्/युवाम्/यूयम्), तद् और एतद् के तीनों वचनों में रूप।
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Sah Eva Mahan Chitrakaarah

'Sah Eva Mahan Chitrakaarah' Class 6 Sanskrit (Deepakam) ka paath hai — यह एक संवाद-कथा है जो बताती है कि प्रकृति के समस्त रंगों का रचयिता परमेश्वर ही सबसे महान् चित्रकार है।

  • 1पाठ एक संवाद-कथा है जो विद्यापीठ के समीप 'अमृत-उद्यान' में घटित होती है; यह उद्यान पाँच हजार से अधिक नित्य और ऋतु-पुष्पों से सुशोभित है।
  • 2छात्र प्रकृति के विभिन्न वर्णों का अवलोकन करते हैं — हरित (हरा), रक्त (लाल), कृष्ण (काला), श्वेत (सफ़ेद), पीत (पीला), नील (नीला), पाटल (गुलाबी), नीललोहित (जामुनी), केसर (केसरिया)।
  • 3प्रमुख पात्र: आचार्य (शिक्षक), श्रद्धा, मेधा, मनीषा, आशित, मञ्जुल, आदित्य।
  • 4पाठ का केंद्रीय संदेश (moral): सर्व निसर्ग (प्रकृति) बहुवर्णमयः है; इन सब वर्णों का योजक परमेश्वर ही सबसे महान् चित्रकार है।
  • 5प्रमुख कठिन शब्द: निसर्गः = प्रकृति; जपापुष्पम् = गुड़हल; चञ्चुः = चोंच; पाटलपुष्पम् = गुलाब; इन्द्रधनुः = इंद्रधनुष; प्रावारकम् = कोट।
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Atithidevo Bhava

'Atithidevo Bhava' Class 6 Sanskrit (Deepakam) ka paath hai — इस कहानी में राधिका नामक लड़की अपने घर की छत पर आई एक बिल्ली और उसके चार शावकों की प्रेमपूर्वक सेवा करती है, और दादी उसे सिखाती हैं कि 'अतिथिदेवो भव' — अतिथि को अपना देवता समझो।

  • 1'अतिथिदेवो भव' उपनिषद् का वचन है — इसका अर्थ है: अतिथि हमारा देवता है और उसकी आदर के साथ सेवा करनी चाहिए।
  • 2भारतीय संस्कृति में अतिथिसेवा पञ्चमहायज्ञों में अंतर्भूत है; न केवल मनुष्य बल्कि अन्य प्राणी भी अतिथि हो सकते हैं।
  • 3राधिका के घर की छत पर एक बिल्ली और उसके चार शावक विशिष्ट अतिथि के रूप में आए; राधिका उन्हें दूध देती और उनकी देखभाल करती थी।
  • 4शावकों के नाम राधिका ने रखे — तन्वी (सुंदर आकृति), मृद्वी (स्पर्श में अत्यंत कोमल), शबलः (चित्रवर्ण / रंग-बिरंगा), भीमः (थोड़ा मोटा)।
  • 5दादी की शिक्षा: अतिथि को देवता समझकर उसकी सेवा करो — राधिका ने इसे मंत्र की तरह दिनभर दोहराया।
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Buddhih Sarvarthasadhika

'Buddhih Sarvarthasadhika' Class 6 Sanskrit (Deepakam) ka paath hai — इस पाठ में एक कथा के माध्यम से बताया गया है कि शरीरबल से बुद्धिबल श्रेष्ठ है; एक चतुर शशकराज ने चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब का उपयोग कर गजराज को भ्रमित किया और सारे शशकों को सुरक्षित किया।

  • 1यह पाठ एक संस्कृत कथा (नैतिक कहानी) है जो सिद्ध करती है कि बुद्धिबल शरीरबल से अधिक महत्त्वपूर्ण है।
  • 2प्रमुख पात्र: शशकराज (बुद्धिमान खरगोश) और गजराज (शक्तिशाली हाथी)।
  • 3शशकराज ने गजराज को बताया कि सरोवर चन्द्रमा का वासस्थान है; जल में चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब दिखाकर उसे भयभीत किया।
  • 4पाठ की केंद्रीय शिक्षा (moral): 'बुद्धिः सर्वार्थसाधिका' — बुद्धि से सभी प्रयोजन सिद्ध होते हैं।
  • 5प्रमुख शब्द-अर्थ: सरोवरः = तालाब, शशकः = खरगोश, गजः = हाथी, प्रतिबिम्बम् = प्रतिबिम्ब, शशाङ्कः = चन्द्रमा, भीताः = डरे हुए, चिन्तामग्नः = चिन्तित।
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Yah Janati Sah Panditah

'Yah Janati Sah Panditah' Class 6 Sanskrit (Deepakam) ka gyaarhaavaan paath hai — इसमें पाँच संस्कृत प्रहेलिकाएँ (पहेलियाँ), षष्ठी विभक्ति का व्याकरण, प्रसिद्ध गुरु-शिष्य युगल, महान संस्कृत ग्रन्थों के रचयिता और दो सुभाषित श्लोक सिखाए गए हैं।

  • 1पाँच संस्कृत प्रहेलिकाएँ और उनके उत्तर: तक्रम् (छाछ), नयनम् (आँख), अनानसः (अनानास), मृत्युम्/जयः, कुम्भकर्णः
  • 2षष्ठी विभक्ति: जहाँ सम्बन्ध हो वहाँ षष्ठी विभक्ति आती है — 'बालकस्य पुस्तकम्'; पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग तीनों में रूप सिखाए गए
  • 3प्रसिद्ध गुरु-शिष्य युगल: वसिष्ठ-श्रीराम, परशुराम-कर्ण, द्रोण-अर्जुन, चाणक्य-चन्द्रगुप्त, शङ्कराचार्य-पद्मपाद, रामकृष्ण-विवेकानन्द
  • 4महान संस्कृत ग्रन्थ और रचयिता: रामायण-वाल्मीकि, महाभारत-व्यास, रघुवंश-कालिदास, पञ्चतन्त्र-विष्णुशर्मा, हितोपदेश-नारायणपण्डित
  • 5प्रमुख शब्दार्थ: तक्रम् = छाछ, पेयम् = पीने के योग्य, कुलालस्य = कुम्हार का, रणे = युद्ध में, सुतः = पुत्र
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Tvam Aapanam Gachha

'Tvam Aapanam Gachha' Class 6 Sanskrit (Deepakam) ka paath hai — इस पाठ में राकेश और उसकी माँ (अम्बा) के बीच संवाद के माध्यम से बाज़ार जाने व सामान खरीदने का वर्णन है, तथा संस्कृत व्याकरण का लोट्लकार (आज्ञा एवं प्रार्थना काल) सिखाया गया है।

  • 1'तवम् आपणं गच्छ' का अर्थ है — तुम बाज़ार जाओ।
  • 2पाठ के मुख्य पात्र: राकेशः (बेटा), अम्बा (माँ) और आपणिकः (दुकानदार)।
  • 3राकेश ने मुद्ग (मूँग), शर्करा (चीनी), गुड (गुड़), विद्लम् (दाल), सर्षप (सरसों), लेखनी (कलम) और चाकलेट खरीदी — कुल ४९० रुपये; ५०० दिए, १० रुपये शेष (अवशिष्टम्) मिले।
  • 4पाठ में लोट्लकार (Imperative Mood) सिखाया गया है — यह आज्ञा (आदेश) और प्रार्थना (मंगलकामना) दोनों अर्थों में प्रयुक्त होता है।
  • 5लोट्लकार के रूप तीनों पुरुषों (प्रथम, मध्यम, उत्तम) और तीनों वचनों (एकवचन, द्विवचन, बहुवचन) में दिए गए हैं; जैसे — पठतु / पठ / पठानि।
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Prithivyam Treeni Ratnani

'Prithivyam Treeni Ratnani' Class 6 Sanskrit (Deepakam) ka paath hai — इस अध्याय में चाणक्यनीति, रामायण, पञ्चतन्त्र आदि प्राचीन ग्रंथों से संकलित आठ नीतिपरक सुभाषित हैं, जो पृथ्वी के तीन रत्न (जल, अन्न, सुभाषित), परिश्रम की महिमा, उदार हृदय, विद्या का फल, और मातृभूमि की श्रेष्ठता सिखाते हैं।

  • 1यह अध्याय आठ सुभाषितों का संग्रह है — ये चाणक्यनीति, मनुस्मृति, पञ्चतन्त्र, हितोपदेश, रामायण और सुभाषितरत्नभाण्डागार जैसे प्राचीन ग्रंथों से लिए गए हैं।
  • 2पृथ्वी के तीन रत्न: जल, अन्न और सुभाषित हैं — मूढ़ (मूढैः) लोग पत्थर के टुकड़ों को रत्न कहते हैं।
  • 3संकुचित मन के लोग 'यह मेरा — यह पराया' (निजः/परः) का भेद करते हैं; किन्तु उदार चरित्र वालों के लिए सारी पृथ्वी (वसुधा) ही परिवार है।
  • 4कार्य परिश्रम (उद्यमेन) से सिद्ध होते हैं, केवल मनोरथ (इच्छा) से नहीं — जैसे सोए सिंह के मुख में मृग स्वयं नहीं जाते।
  • 5जो प्रतिदिन बड़ों का अभिवादन करता है और उनकी सेवा करता है, उसके आयु, विद्या, यश और बल — ये चारों बढ़ते हैं।
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Aalasyam Hi Manushyanam Shareerasthah Mahan Ripuh

'Aalasyam Hi Manushyanam Shareerasthah Mahan Ripuh' Class 6 Sanskrit (Deepakam) ka paath hai — इस पाठ में एक स्वस्थ भिक्षुक की कथा के माध्यम से यह सिखाया गया है कि आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है और परिश्रम ही सच्चा मित्र।

  • 1पाठ में एक स्वस्थ एवं दृढकाय युवा भिक्षुक की कथा है जो भिक्षाटन करता था — मार्ग में मिलने वाले सभी से धन या भिक्षा माँगता था।
  • 2एक धनिक ने भिक्षुक के पादों के लिए सहस्र रूप्यकाणि और हस्तों के लिए पञ्चसहस्र रूप्यकाणि देने का प्रस्ताव रखा, किंतु भिक्षुक ने प्रत्येक बार निराकृत (अस्वीकार) किया।
  • 3धनिक ने उपदेश दिया कि तुम्हारे पास ही हजारों से अधिक मूल्य की वस्तुएँ हैं; सौभाग्य से मिले मानव जन्म को सफल बनाने के लिए प्रयत्न करो।
  • 4उस दिन से भिक्षुक ने भिक्षाटन त्यागकर परिश्रम से धनार्जन किया और सगौरवं जीवनयापन आरंभ किया।
  • 5मुख्य सुभाषित: "आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः। नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति।।" — आलस्य मनुष्य के शरीर में स्थित महान शत्रु है; परिश्रम के समान कोई मित्र नहीं जिसे करने से कोई दुखी नहीं होता।
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Madhavasya Priyam Angam

'Madhavasya Priyam Angam' Class 6 Sanskrit (Deepakam) ka paath hai — इस कथा में माधव के शरीर के अंग स्वप्न में एक-दूसरे से श्रेष्ठता पर चर्चा करते हैं और माधव सभी को समझाता है कि शरीर के सभी अंग समान रूप से उपकारक और उसे प्रिय हैं।

  • 1इस पाठ में माधव नामक बालक स्वप्न में अपने शरीर के अंगों की परस्पर चर्चा देखता है।
  • 2पाद, हस्त, नयन, कर्ण, मुख और उदर — प्रत्येक अंग अपनी विशेषता बताते हुए स्वयं को श्रेष्ठ बताता है।
  • 3माधव सभी को समझाता है — उसके शरीर के सभी अंग उसके लिए उपकारक और प्रिय हैं; सभी श्रेष्ठ हैं।
  • 4पाठ में शरीर के अनेक अंगों के संस्कृत नाम सिखाए गए हैं — ललाटम्, नासिका, कर्णः, मुखम्, उदरम्, हस्तः, पादः आदि।
  • 5कठिन शब्द: स्वप्ने = स्वप्न में; अनुक्षणम् = उसी समय; उपकारकाणि = सहायता करने वाले; सबलाः = बलवान्।
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Vrikshaah Satpurushaah Iva

'Vrikshaah Satpurushaah Iva' Class 6 Sanskrit (Deepakam) ka paath hai — इस पाठ में सुभाषितों के माध्यम से बताया गया है कि वृक्ष सत्पुरुषों के समान परोपकारी होते हैं — वे स्वयं तपती धूप में खड़े रहते हुए भी दूसरों को छाया, फल और सब कुछ प्रदान करते हैं।

  • 1पाठ का केंद्रीय विषय: वृक्ष सत्पुरुषों के समान परोपकारी होते हैं — स्वयं धूप (आतप) में खड़े रहकर दूसरों को छाया और फल देते हैं।
  • 2पाठ में छह सुभाषित हैं जो वृक्षों की महत्ता, नदियों-गायों-बादलों की उदारता और परोपकार की भावना को समझाते हैं।
  • 3मुख्य नैतिक संदेश: परोपकार ही सज्जन का गुण है; 'परोपकारार्थम् इदं शरीरम्' — यह शरीर भी दूसरों के उपकार के लिए है।
  • 4एक वृक्ष का मूल्य: दश कुएँ = एक वापी (बावड़ी); दश वापी = एक ह्रद (तालाब); दश ह्रद = एक पुत्र; दश पुत्र = एक वृक्ष (द्रुम) — वृक्ष सर्वाधिक उपकारक है।
  • 5वृक्ष जो देते हैं: पुष्प, पत्र, फल, छाया, मूल, वल्कल (छाल) और दारु (काष्ठ/लकड़ी) — कोई भी याचक (अर्थी) निराश नहीं जाता।

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