Chapter 15 — Shram Vibhajan Aur Jaati Pratha, Meri Kalpana Ka Adarsh Samaj
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NCERT Class 12 Hindi Aroh Shram Vibhajan Aur Jaati Pratha, Meri Kalpana Ka Adarsh Samaj यह पाठ डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा लिखित विचारात्मक निबंध है जिसमें जाति-प्रथा को श्रम विभाजन का अस्वाभाविक रूप सिद्ध कर आदर्श समाज की स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता पर आधारित कल्पना प्रस्तुत की गई है।
यह पाठ डॉ. भीमराव आंबेडकर के विख्यात भाषण 'एनीहिलेशन ऑफ कास्ट' (1936) के ललई सिंह यादव कृत हिंदी-रूपांतर 'जाति-भेद का उच्छेद' के दो प्रकरण हैं। पहले प्रकरण में आंबेडकर सिद्ध करते हैं कि जाति-प्रथा न केवल श्रम-विभाजन बल्कि श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन है जो मनुष्य की रुचि व क्षमता के आधार पर नहीं, बल्कि जन्म के आधार पर पेशा निर्धारित करती है और पेशा-परिवर्तन की स्वतंत्रता न देकर बेरोजगारी का कारण बनती है। दूसरे प्रकरण में वे स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता पर आधारित आदर्श समाज की कल्पना प्रस्तुत करते हैं जहाँ लोकतंत्र सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति हो।
Key points & formulas
- 01लेखक परिचय: डॉ. भीमराव आंबेडकर — जन्म 14 अप्रैल 1891, महू (मध्य प्रदेश); निधन दिसंबर 1956, दिल्ली; भारतीय संविधान के निर्माताओं में से एक; दलितों, स्त्रियों और मजदूरों के अधिकारों के लिए आजीवन संघर्षरत।
- 02विधा: विचारात्मक निबंध (गद्य); मूल अंग्रेज़ी भाषण 'एनीहिलेशन ऑफ कास्ट' (1936) का ललई सिंह यादव कृत हिंदी-रूपांतर 'जाति-भेद का उच्छेद' के दो प्रकरण; यह भाषण जाति-पाँति तोड़क मंडल (लाहौर) के 1936 के वार्षिक सम्मेलन हेतु तैयार हुआ था, परंतु सम्मेलन स्थगित होने से पढ़ा न जा सका।
- 03केंद्रीय भाव: जाति-प्रथा श्रम विभाजन नहीं बल्कि श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन है — यह विभिन्न वर्गों को ऊँच-नीच भी करार देती है; मनुष्य की रुचि या क्षमता नहीं, 'पूर्व लेख' (जन्म से निर्धारित नियति) इसका आधार है।
- 04जाति-प्रथा और बेरोजगारी: पेशा परिवर्तन की अनुमति न देने से, भले ही पेशा अनुपयुक्त हो और मनुष्य भूखों मरे, वह उसमें जीवन-भर बँधा रहता है — इस प्रकार जाति-प्रथा बेरोजगारी का एक प्रमुख व प्रत्यक्ष कारण बनी हुई है।
- 05आदर्श समाज की कल्पना: स्वतंत्रता, समता, भ्रातृता पर आधारित; आंबेडकर के अनुसार 'लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति ही नहीं है, लोकतंत्र मूलतः सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम है।'
- 06दासता की परिभाषा: 'दासता केवल कानूनी पराधीनता को ही नहीं कहा जा सकता' — इसमें वह स्थिति भी सम्मिलित है जिससे कुछ व्यक्तियों को दूसरे लोगों के द्वारा निर्धारित व्यवहार एवं कर्तव्यों का पालन करने के लिए विवश होना पड़ता है।
- 07प्रेरक व्यक्तित्व: बुद्ध, कबीर और ज्योतिबा फुले; 14 अक्तूबर 1956 को 5 लाख अनुयायियों के साथ बौद्ध मतानुयायी बने।
- 08कठिन शब्दार्थ: 'विडंबना' = दुखद विसंगति; 'पूर्व लेख' = जन्म से पूर्व-निर्धारित नियति, जिसे बदला न जा सके; 'उच्छेद' = जड़ से समाप्त करना, उन्मूलन।
Frequently asked questions
01यह पाठ किसने लिखा है?
यह पाठ डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा रचित है। वे 14 अप्रैल 1891 को महू (मध्य प्रदेश) में जन्मे और दिसंबर 1956 में दिल्ली में उनका निधन हुआ। वे भारतीय संविधान के निर्माताओं में से एक थे।
02Shram Vibhajan Aur Jaati Pratha ka mool srot kya hai?
यह पाठ आंबेडकर के विख्यात भाषण 'एनीहिलेशन ऑफ कास्ट' (1936) के ललई सिंह यादव द्वारा कृत हिंदी-रूपांतर 'जाति-भेद का उच्छेद' के दो प्रकरणों के तौर पर है। यह भाषण जाति-पाँति तोड़क मंडल (लाहौर) के वार्षिक सम्मेलन 1936 के लिए तैयार हुआ था।
03आंबेडकर के अनुसार जाति-प्रथा और श्रम विभाजन में क्या अंतर है?
आंबेडकर के अनुसार जाति-प्रथा श्रम विभाजन के साथ-साथ श्रमिक-विभाजन का भी रूप लिए हुए है। श्रम विभाजन में विभिन्न वर्गों को ऊँच-नीच नहीं किया जाता, किंतु जाति-प्रथा में यह होता है — जो विश्व के किसी भी समाज में नहीं पाया जाता। साथ ही जाति-प्रथा में पेशा मनुष्य की रुचि या क्षमता पर नहीं, बल्कि जन्म (माता-पिता के सामाजिक स्तर) पर निर्भर है।
04आंबेडकर के आदर्श समाज के तीन तत्त्व क्या हैं?
आंबेडकर के अनुसार आदर्श समाज स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता (भाईचारे) पर आधारित होगा। ऐसे समाज में 'दूध-पानी के मिश्रण की तरह' भाईचारा होगा, और इसी का दूसरा नाम लोकतंत्र है।
05लेखक के मत से 'दासता' की व्यापक परिभाषा क्या है?
आंबेडकर के अनुसार 'दासता केवल कानूनी पराधीनता को ही नहीं कहा जा सकता।' दासता में वह स्थिति भी सम्मिलित है जिससे कुछ व्यक्तियों को दूसरे लोगों के द्वारा निर्धारित व्यवहार एवं कर्तव्यों का पालन करने के लिए विवश होना पड़ता है — जैसे जाति-प्रथा में अपनी इच्छा के विरुद्ध पेशे अपनाने पड़ते हैं।
06जाति-प्रथा बेरोजगारी का कारण कैसे है?
जाति-प्रथा किसी भी व्यक्ति को ऐसा पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती जो उसका पैतृक पेशा न हो। आधुनिक युग में उद्योग-धंधों में निरंतर परिवर्तन होता है जिससे पेशा बदलने की आवश्यकता पड़ती है, लेकिन जाति-प्रथा यह अनुमति नहीं देती। इस प्रकार पेशा परिवर्तन की अनुमति न देकर जाति-प्रथा बेरोजगारी का एक प्रमुख व प्रत्यक्ष कारण बनी हुई है।
07Ambedkar ne 'samata' ko vyavaharik siddhant kyon mana hai?
आंबेडकर के अनुसार 'समता' यद्यपि काल्पनिक जगत की वस्तु है, फिर भी यह 'नियामक सिद्धांत' है। एक राजनीतिज्ञ के पास हर व्यक्ति की अलग आवश्यकता और क्षमता के अनुसार व्यवहार करने का समय व जानकारी नहीं होती, इसलिए सबके साथ समान व्यवहार ही व्यावहारिक एकमात्र कसौटी है।
08आंबेडकर के प्रेरक व्यक्तित्व कौन थे?
पाठ के अनुसार आंबेडकर के चिंतन व रचनात्मकता के मुख्यतः तीन प्रेरक व्यक्ति रहे — बुद्ध, कबीर और ज्योतिबा फुले। जातिवादी उत्पीड़न के कारण हिंदू समाज से मोहभंग के बाद वे बुद्ध के समतावादी दर्शन में आश्वस्त हुए।
09आंबेडकर ने बौद्ध धर्म कब ग्रहण किया?
14 अक्तूबर 1956 को 5 लाख अनुयायियों के साथ आंबेडकर बौद्ध मतानुयायी बन गए।
10इस पाठ में लोकतंत्र की परिभाषा कैसे दी गई है?
आंबेडकर के अनुसार 'लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति ही नहीं है, लोकतंत्र मूलतः सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम है।' इसमें साथियों के प्रति श्रद्धा व सम्मान का भाव आवश्यक है।
11यह भाषण मूल रूप से किस सम्मेलन के लिए तैयार हुआ था और इसे क्यों नहीं पढ़ा जा सका?
यह भाषण जाति-पाँति तोड़क मंडल (लाहौर) के वार्षिक सम्मेलन 1936 के अध्यक्षीय भाषण के रूप में तैयार किया गया था। परंतु इसकी क्रांतिकारी दृष्टि से आयोजकों की पूर्णतः सहमति न बन सकने के कारण सम्मेलन ही स्थगित हो गया और यह पढ़ा न जा सका। बाद में आंबेडकर ने इसे स्वतंत्र पुस्तिका के रूप में प्रकाशित कर वितरित किया।
12क्या इस पाठ का PDF मुफ़्त डाउनलोड कर सकते हैं?
हाँ, यह मुफ़्त है, बिना साइन-अप।
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