Summary
NCERT Class 12 Hindi Aroh Shirish Ke Phool हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित ललित निबंध है जो उनके संग्रह 'कल्पलता' से उद्धृत है; इसमें शिरीष वृक्ष के माध्यम से मनुष्य की अजेय जिजीविषा और गांधीजी जैसी अनासक्त जीवन-दृष्टि को महान मानवीय मूल्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
हजारी प्रसाद द्विवेदी रचित यह ललित निबंध 'कल्पलता' संग्रह से उद्धृत है। जेठ की जलती धूप, आँधी और लू में भी फूलते रहने वाले शिरीष वृक्ष को लेखक 'कालजयी अवधूत' कहता है। शिरीष के पुराने फलों की अधिकार-लिप्सा के माध्यम से उन नेताओं पर व्यंग्य किया गया है जो समय रहते जगह नहीं छोड़ते। कालिदास, कबीर और रवींद्रनाथ की अनासक्ति को सच्चे कवि की अनिवार्य शर्त बताया गया है। अंत में गांधीजी की तुलना शिरीष से की गई है — दोनों वायुमंडल से रस खींचकर एक साथ कोमल और कठोर बने रहे।
Key points & formulas
- 01लेखक परिचय: हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म सन् 1907 में आरत दुबे का छपरा, बलिया (उत्तर प्रदेश) में हुआ; मृत्यु सन् 1979 में दिल्ली में हुई; उन्हें 'आलोक पर्व' पर साहित्य अकादेमी पुरस्कार, भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण और लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा डी.लिट् की उपाधि प्राप्त हुई।
- 02विधा और स्रोत: यह ललित निबंध है जो द्विवेदी जी के निबंध-संग्रह 'कल्पलता' से उद्धृत है; निबंध-विधा में इनका साहित्य व्यक्तित्व-व्यंजना और आत्मपरक शैली से युक्त है।
- 03केंद्रीय भाव: जेठ की प्रचंड गरमी और लू में भी अविचल फूलते रहने के कारण शिरीष को 'कालजयी अवधूत की भाँति जीवन की अजेयता का मंत्र प्रचार' करने वाला बताया गया है; यह अजेय जिजीविषा और धैर्यपूर्ण कर्तव्यशीलता का प्रतीक है।
- 04गांधीजी और शिरीष की समानता: लेखक लिखता है — 'शिरीष वायुमंडल से रस खींचकर इतना कोमल और इतना कठोर है। गांधी भी वायुमंडल से रस खींचकर इतना कोमल और इतना कठोर हो सका था।' अवधूत गांधी की अनुपस्थिति पर लेखक की पीड़ा — 'हाय, वह अवधूत आज कहाँ है!'
- 05पुरानी पीढ़ी पर व्यंग्य: शिरीष के पुराने फल नए पत्ते-फलों के धकेलने तक स्थान नहीं छोड़ते; लेखक इसे उन नेताओं से जोड़ता है 'जो किसी प्रकार जमाने का रुख नहीं पहचानते'; संदेश — 'हिलते-डुलते रहो, स्थान बदलते रहो, आगे की ओर मुँह किए रहो तो कोड़े की मार से बच भी सकते हो। जमे कि मरे!'
- 06सत्कवि की शर्त: 'योगी की अनासक्त शून्यता और प्रेमी की सरस पूर्णता एक साथ उपलब्ध होना सत्कवि होने की एकमात्र शर्त है'; कालिदास को महान इसलिए माना कि वे अनासक्त रह सके; रवींद्रनाथ का वचन — 'असल गंतव्य स्थान उसे अतिक्रम करने के बाद ही है।'
- 07कठिन शब्दार्थ (पाठ की शब्द-छवि से): अवधूत — सांसारिक बंधनों व विषय-वासनाओं से ऊपर उठा हुआ संन्यासी; अनासक्त — विषय-भोग से ऊपर उठा हुआ; निर्घात — बिना आघात या बाधा के; दुरंत — जिसका विनाश होना मुश्किल है; ऊर्ध्वमुखी — प्रगति की दिशा में।
- 08उद्धृत पंक्तियाँ: तुलसीदास — 'धरा को प्रमान यही तुलसी जो फरा सो झरा, जो बरा सो बुताना!'; कबीरदास — 'दिन दस फूला फूलिके खंखड़ भया पलास!'; कालिदास — 'पदं सहेत भ्रमरस्य पेलवं शिरीष पुष्पं न पुनः पतत्रिणाम्।'
Frequently asked questions
01शिरीष के फूल पाठ के लेखक कौन हैं?
इस ललित निबंध के लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं। उनका जन्म सन् 1907 में आरत दुबे का छपरा, बलिया (उत्तर प्रदेश) में हुआ था और मृत्यु सन् 1979 में दिल्ली में हुई।
02Shirish Ke Phool kis sangrah se liya gaya hai?
यह निबंध हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध-संग्रह 'कल्पलता' से उद्धृत है।
03लेखक ने शिरीष को 'कालजयी अवधूत' क्यों कहा है?
जेठ की जलती धूप, भयंकर लू और उमस में भी शिरीष नीचे से ऊपर तक फूलों से लदा रहता है। पाठ में लिखा है — 'एकमात्र शिरीष कालजयी अवधूत की भाँति जीवन की अजेयता का मंत्र प्रचार करता रहता है।' इसीलिए लेखक उसे अवधूत कहता है।
04पाठ में तुलसीदास का कौन-सा कथन उद्धृत है?
पाठ में तुलसीदास का यह कथन उद्धृत है — 'धरा को प्रमान यही तुलसी जो फरा सो झरा, जो बरा सो बुताना!' लेखक इससे यह दिखाता है कि जरा और मृत्यु जगत के अतिपरिचित और अतिप्रामाणिक सत्य हैं।
05Shirish Ke Phool mein Gandhi ji ka ullekh kyon hua hai?
लेखक शिरीष की तुलना गांधीजी से करता है क्योंकि दोनों विपरीत परिस्थितियों में भी अविचल रहे। पाठ में लिखा है — 'शिरीष वायुमंडल से रस खींचकर इतना कोमल और इतना कठोर है। गांधी भी वायुमंडल से रस खींचकर इतना कोमल और इतना कठोर हो सका था।'
06पाठ के अनुसार सत्कवि होने की शर्त क्या है?
पाठ के अनुसार — 'योगी की अनासक्त शून्यता और प्रेमी की सरस पूर्णता एक साथ उपलब्ध होना सत्कवि होने की एकमात्र शर्त है।' जो कवि अनासक्त और फक्कड़ नहीं बन सका, वह सच्चा कवि नहीं हो सकता।
07शिरीष के पुराने फलों की तुलना किससे की गई है?
शिरीष के पुराने फल नए फल-पत्तों के धकेलने तक अपनी जगह नहीं छोड़ते। लेखक इनकी तुलना उन नेताओं से करता है 'जो किसी प्रकार जमाने का रुख नहीं पहचानते और जब तक नयी पौध के लोग उन्हें धक्का मारकर निकाल नहीं देते तब तक जमे रहते हैं।'
08कालिदास को लेखक ने किस कारण महान माना है?
पाठ में लेखक कहता है — 'कालिदास महान थे, क्योंकि वे अनासक्त रह सके थे।' वे 'अनासक्त योगी की स्थिर-प्रज्ञता और विदग्ध प्रेमी का हृदय' पा चुके थे और सौंदर्य के बाह्य आवरण को भेदकर उसके भीतर तक पहुँच सकते थे।
09पाठ में कबीरदास का कौन-सा उद्धरण है?
पाठ में कबीरदास का यह उद्धरण है — 'दिन दस फूला फूलिके खंखड़ भया पलास!' लेखक इससे यह दिखाता है कि थोड़े दिन फूलकर झड़ जाने वाले फूलों की अपेक्षा लंबे समय तक टिके रहने वाला शिरीष श्रेष्ठ है।
10'अवधूत' शब्द का अर्थ क्या है?
पाठ की शब्द-छवि के अनुसार 'अवधूत' का अर्थ है — 'सांसारिक बंधनों व विषय-वासनाओं से ऊपर उठा हुआ संन्यासी।' पाठ में शिरीष और गांधीजी दोनों को इस अर्थ में अवधूत कहा गया है।
11Shirish ke phool chapter ka kendriya sandesh kya hai?
पाठ का केंद्रीय संदेश है कि विपरीत परिस्थितियों में भी अविचल रहना और आगे बढ़ते रहना सबसे बड़ा मानवीय मूल्य है। पाठ में लिखा है — 'हिलते-डुलते रहो, स्थान बदलते रहो, आगे की ओर मुँह किए रहो तो कोड़े की मार से बच भी सकते हो। जमे कि मरे!'
12'फूल हो या पेड़, वह इशारा है' — इस पंक्ति का आशय क्या है?
लेखक रवींद्रनाथ के विचारों के संदर्भ में लिखता है — 'फूल हो या पेड़, वह अपने-आप में समाप्त नहीं है। वह किसी अन्य वस्तु को दिखाने के लिए उठी हुई अँगुली है। वह इशारा है।' अर्थात शिरीष का फूल केवल फूल नहीं, अनासक्त जीवन-दृष्टि का संकेत है।
13हजारी प्रसाद द्विवेदी को कौन-से पुरस्कार मिले?
पाठ के अनुसार उन्हें 'आलोक पर्व' पर साहित्य अकादेमी पुरस्कार, भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण और लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा डी.लिट् की उपाधि प्रदान की गई।
14क्या इस पाठ का PDF मुफ़्त डाउनलोड कर सकते हैं?
हाँ, यह मुफ़्त है, बिना साइन-अप।
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