Class 11 Sanskrit

Chapter 4 — Sauvarnshakatika

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Overview

Summary

NCERT Class 11 Sanskrit Shashwati Sauvarnshakatika — यह पाठ महाकवि शूद्रक-प्रणीत संस्कृत नाटक 'मृच्छकटिक' के छठे अंक से लिया गया गद्य-नाट्यांश है, जिसमें गणिका वसन्तसेना की वात्सल्यमयी उदारता और बालक रोहसेन की मार्मिक जिद का हृदयस्पर्शी चित्रण है।

इस नाट्यांश में धनहीन आर्यचारुदत्त का पुत्र रोहसेन, पड़ोसी बच्चे की सोने की गाड़ी (सौवर्णशकटिका) देखकर रोने लगता है। दासी रदनिका उसे मिट्टी की गाड़ी देकर बहलाने का प्रयास करती है, पर रोहसेन नहीं मानता। रदनिका उसे गणिका वसन्तसेना के पास ले जाती है। वसन्तसेना बालक की निर्मल पीड़ा से द्रवित होकर अपने सभी आभूषण उतारकर उसे दे देती है ताकि वह सोने की गाड़ी बनवा सके। रोहसेन वसन्तसेना को रोते देख आभूषण लेने से मना करता है; तब वसन्तसेना आँसू पोंछकर उसे हँसते हुए खेलने भेज देती है।

Essentials

Key points & formulas

  1. 01यह पाठ महाकवि शूद्रक-प्रणीत संस्कृत नाटक 'मृच्छकटिक' (प्रकरण विधा) के छठे अंक से लिया गया गद्य-नाट्यांश है; मृच्छकटिक तत्कालीन समाज का दर्पण माना जाता है।
  2. 02मुख्य पात्र: रोहसेन (आर्यचारुदत्त का पुत्र), रदनिका (दासी), वसन्तसेना (उज्जयिनी की गणिका)।
  3. 03केंद्रीय भाव: बाल-मन की सहज इच्छा और वसन्तसेना की वात्सल्यमयी उदारता — उसने बिना संकोच अपने सारे आभूषण बालक को दे दिए।
  4. 04उल्लेखनीय संवाद — वसन्तसेना रोहसेन को देखकर कहती है: 'अनलघ्कृत-शरीरोऽपि चन्द्रमुख आनन्दयति मम हृदयम्' — बिना आभूषण के भी यह चंद्रमुख बालक मेरा हृदय प्रसन्न करता है।
  5. 05वसन्तसेना भाग्य की विडंबना व्यक्त करती है: 'पुष्करपत्रपतितजलबिन्दुसदृशैः क्रीडसि त्वं पुरुषभागधेयैः' — हे भगवन्, तुम मनुष्यों के भाग्य से कमलपत्र पर गिरी जल-बूँद के समान खेलते हो।
  6. 06रोहसेन की निर्मलता — जब वसन्तसेना रोई तो उसने कहा 'अपेहि, न ग्रहीष्यामि। रोदिषि त्वम्' — दूर हटो, मैं नहीं लूँगा, तुम रो रही हो; यह बाल-हृदय की करुणा दर्शाता है।
  7. 07कठिन शब्दार्थ — सौवर्णशकटिकाम् = सुवर्णनिर्मितां गन्त्रीम् (सोने की गाड़ी); मुग्धेन मुखेन = कोमलेन निर्दोषेण मुखेन (भोले मुख से); परसम्पत्त्या = अन्यस्य समृद्ध्या (पराई समृद्धि से); प्रातिवेशिकः = प्रतिवेशे निकटे स्थितः (पड़ोस में रहने वाला)।
Questions

Frequently asked questions

01

सौवर्णशकटिका पाठ किस नाटक से लिया गया है?

यह पाठ महाकवि शूद्रक-प्रणीत संस्कृत नाटक 'मृच्छकटिक' के छठे अंक से लिया गया नाट्यांश है। मृच्छकटिक एक प्रकरण विधा का नाटक है।

02

Sauvarnshakatika ke lekhak kaun hain?

इस पाठ के मूल नाटक 'मृच्छकटिक' के रचयिता महाकवि शूद्रक हैं।

03

रोहसेन क्यों रो रहा था?

रोहसेन ने पड़ोसी बच्चे (प्रातिवेशिकगृहपतिदारक) की सोने की गाड़ी से खेलते देखा था और वह गाड़ी उस बच्चे ने ले ली। इसके बाद रोहसेन भी सोने की गाड़ी (सौवर्णशकटिका) की माँग पर अड़ गया।

04

रदनिका ने रोहसेन को बहलाने के लिए क्या किया?

रदनिका ने रोहसेन को मिट्टी की गाड़ी (मृत्तिकाशकटिका) बनाकर दी, पर रोहसेन ने उसे अस्वीकार कर दिया और सोने की गाड़ी ही माँगता रहा।

05

वसन्तसेना ने रोहसेन के लिए क्या किया?

वसन्तसेना ने बालक की पीड़ा से द्रवित होकर अपने सभी आभूषण (आभरणानि) उतारकर रोहसेन को दे दिए और कहा — इनसे सोने की गाड़ी बनवा लो (कारय सौवर्णशकटिकाम्)।

06

Rohsen ne aabhushan lene se kyun mana kiya?

रोहसेन ने देखा कि वसन्तसेना रो रही है, इसलिए उसने कहा — 'अपेहि, न ग्रहीष्यामि। रोदिषि त्वम्' — दूर हटो, मैं नहीं लूँगा, तुम रो रही हो। यह बालक के कोमल हृदय की करुणा है।

07

'पुष्करपत्रपतितजलबिन्दु' का अर्थ क्या है?

पुष्करपत्रम् = कमल का पत्ता; इस संवाद में वसन्तसेना भाग्य की क्षणभंगुरता पर विचार करती है — हे भगवन्, तुम मनुष्यों के भाग्य से कमलपत्र पर गिरी जल-बूँद के समान खेलते हो।

08

मृच्छकटिक किस समाज का चित्रण करता है?

स्रोत के अनुसार मृच्छकटिक उस युग की अराजकता, समाज में व्याप्त कुरीति, द्यूतव्यसन, चौर्यवृत्ति, न्यायालय में पक्षपात तथा राजा के सगे-संबन्धियों के स्वैराचार का प्रामाणिक चित्रण करता है।

09

Vasantasena ka charitra kaisa hai?

वसन्तसेना उज्जयिनी की गणिका है किन्तु वह वात्सल्यमयी और उदार है। उसने रोहसेन को बिना आभूषणों के भी 'चन्द्रमुख' कहा और बिना संकोच अपने सभी आभूषण दे दिए — यह उसकी करुणा और उदारता दर्शाता है।

10

शाश्वती कक्षा 11 चतुर्थ पाठ का नाम क्या है?

शाश्वती कक्षा 11 का चतुर्थ पाठ 'सौवर्णशकटिका' है जो महाकवि शूद्रक के नाटक मृच्छकटिक से लिया गया है।

11

'अलीकम्' और 'अलघ्कृता' का अर्थ क्या है?

पाठ के शब्दार्थ के अनुसार — अलीकम् = असत्यम् (झूठ); अलघ्कृता = विभूषिता (आभूषण पहने हुई)। रोहसेन ने रदनिका से कहा 'अलीकं त्वं भणसि' — अर्थात तुम झूठ बोलती हो।

12

क्या इस पाठ का PDF मुफ़्त डाउनलोड कर सकते हैं?

हाँ, यह मुफ़्त है, बिना साइन-अप।

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