Summary
NCERT Class 11 Sanskrit Shashwati Ishah Kutrasti (ईशः कुत्रस्ति) यह पाठ नोबेल पुरस्कार विजेता रवीन्द्रनाथ टैगोर की विश्वविख्यात कृति 'गीतांजलि' के संस्कृत अनुवाद से संकलित एक काव्य-पाठ है, जिसके अनुवादक कोल-व्यासराय शास्त्री हैं।
इस काव्य-पाठ में कवि प्रश्न करता है — ईश्वर कहाँ है? उसका उत्तर है कि ईश्वर बंद दरवाजे वाले अंधकारयुक्त मंदिर में नहीं, बल्कि उस किसान के पास है जो कठिन भूमि जोतता है, उस मजदूर के पास है जो सड़क बनाने के लिए पत्थर तोड़ता है, और उन श्रमिकों के साथ है जो वर्षा-धूप में मैले वस्त्रों से काम करते हैं। कवि भक्त को जप-माला और धूप-फूल त्यागकर कर्मक्षेत्र में जाने की प्रेरणा देता है, क्योंकि ईश्वर हमारा हित चाहते हुए हमारे निकट ही रहता है।
Key points & formulas
- 01पाठ का स्रोत: यह पाठ रवीन्द्रनाथ टैगोर की विश्वविख्यात कृति 'गीतांजलि' के संस्कृत अनुवाद से संकलित है; अनुवादक कोल-व्यासराय शास्त्री हैं।
- 02विधा: पद्य (काव्य) — शाश्वती का नवमः पाठः।
- 03केंद्रीय भाव: ईश्वर बंद मंदिरों में नहीं, खेत-खलिहान और कर्मक्षेत्र में श्रमिकों के बीच हैं; सच्ची भक्ति श्रम-सेवा में है।
- 04प्रमुख श्लोक (verbatim): 'देवागारे पिहितद्वारे / तमोवृतेऽस्मिन् भजसे कम् ? / त्यज जपमालां त्यज तव गानं / नास्त्यत्रेशः स्फुटय दृशम्॥' — भावार्थ: बंद द्वार वाले अंधकारयुक्त देवमंदिर में तुम किसकी आराधना कर रहे हो? यहाँ ईश्वर नहीं है, आँखें खोलो।
- 05दूसरे श्लोक में कवि कहते हैं — ईश्वर वहाँ है जहाँ लाङ्गलिक (हलवाहा) कठिन भूमि जोत रहा है और जनपद की सड़क बनाने वाला पत्थर के टुकड़े तोड़ रहा है।
- 06कवि की प्रेरणा: जप-माला, धूप-फूल और मंदिर के ध्यान को छोड़कर पसीने से लथपथ होकर कर्मक्षेत्र में खड़े रहो; यदि वस्त्र धूलयुक्त या फटे-पुराने हो जाएँ तो चिंता न करो।
- 07कठिन शब्दार्थ: देवागारे = देवमंदिर में; लाङ्गलिकः = हलवाहा; सविधे = समीप में; मलिनवपुः = मैलयुक्त शरीर वाला (दीन); पांसुरभूमिम् = धूलधूसरित जमीन पर।
Frequently asked questions
01ईशः कुत्रस्ति पाठ किस पुस्तक से लिया गया है?
यह पाठ नोबेल पुरस्कार विजेता रवीन्द्रनाथ टैगोर की विश्वविख्यात कृति 'गीतांजलि' के संस्कृत अनुवाद से संकलित है।
02Ishah Kutrasti ke anuvadak kaun hain?
इस पाठ के अनुवादक कोल-व्यासराय शास्त्री हैं।
03कवि के अनुसार ईश्वर कहाँ मिलते हैं?
कवि के अनुसार ईश्वर बंद मंदिरों में नहीं, बल्कि उन किसानों, मजदूरों और गरीबों के बीच मिलते हैं जो कठिन परिश्रम करते हैं।
04लाङ्गलिकः का अर्थ क्या है?
लाङ्गलिकः का अर्थ है हलवाहा — वह व्यक्ति जो हल चलाता है।
05Class 11 Sanskrit Shashwati Chapter 9 mein kya sandesh diya gaya hai?
इस पाठ का संदेश है कि सच्ची भक्ति जप-माला और मंदिर में नहीं, बल्कि श्रमिकों की सेवा और कर्म में है। ईश्वर दीन-दुखियों के निकट रहते हैं।
06'देवागारे पिहितद्वारे' का अर्थ क्या है?
देवागारे पिहितद्वारे का अर्थ है — बंद दरवाजे वाले देवमंदिर में। कवि कहते हैं कि अंधकारयुक्त ऐसे मंदिर में ईश्वर नहीं हैं।
07सविधे और मलिनवपुः का अर्थ बताइए।
सविधे का अर्थ है — समीप में। मलिनवपुः का अर्थ है — मैलयुक्त शरीर वाला अर्थात् दीन। ईश्वर ऐसे दीन श्रमिकों के निकट रहते हैं।
08इस पाठ में कवि किस प्रकार की भक्ति का विरोध करते हैं?
कवि बाह्य आडंबरयुक्त भक्ति का विरोध करते हैं — जप-माला, धूप-फूल, बंद मंदिर में ध्यान। वे कहते हैं कि यह दिखावा है, असली ईश्वर श्रमिकों के बीच हैं।
09Shashwati ka 9th chapter kis granth se liya gaya hai?
शाश्वती का नवमः पाठः 'ईशः कुत्रस्ति' रवीन्द्रनाथ टैगोर की 'गीतांजलि' के संस्कृत अनुवाद से लिया गया है।
10ईश्वर वर्षा और धूप में किसके साथ रहता है?
स्रोत के अनुसार ईश्वर वर्षा और धूप में मलिन वपु (दीन शरीर) वाले श्रमिकों के साथ रहता है — वह हमारा हित चाहते हुए हमारे समीप ही रहता है।
11कवि भक्त को कर्मक्षेत्र में क्यों जाने को कहते हैं?
कवि कहते हैं कि ईश्वर पसीने से लथपथ श्रमिकों के निकट कर्मक्षेत्र में हैं; वहाँ जाने पर ही उनका दर्शन होगा, मंदिर में नहीं।
12क्या इस पाठ का PDF मुफ़्त डाउनलोड कर सकते हैं?
हाँ, यह मुफ़्त है, बिना साइन-अप।
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