Class 11 Sanskrit

Chapter 10 — Sattvamaho Rajastamah

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Overview

Summary

NCERT Class 11 Sanskrit Shashwati Sattvamaho Rajastamah यह श्रीमद्भगवद्गीता से संकलित पद्य-पाठ है, जिसमें जीवों की स्वभावजन्य श्रद्धा तथा सत्त्व, रजस् एवं तमः — इन तीन गुणों के आधार पर आहार, तप और दान के त्रिविध भेदों का वर्णन किया गया है।

यह पाठ श्रीमद्भगवद्गीता से संकलित है। इसमें बताया गया है कि प्रत्येक प्राणी की श्रद्धा स्वभाव के अनुसार सात्त्विकी, राजसी अथवा तामसी होती है। सात्त्विक आहार आयु, बल और स्वास्थ्य बढ़ाने वाला होता है; राजस आहार दुःख और शोक देने वाला होता है; तामस आहार बासी और अपवित्र होता है। तप शारीरिक, वाचिक और मानसिक — तीन प्रकार का होता है। दान भी सात्त्विक, राजस और तामस — तीन प्रकार का होता है। निःस्वार्थ भाव से, उचित देश-काल-पात्र में दिया गया दान सात्त्विक कहलाता है।

Essentials

Key points & formulas

  1. 01पाठ की विधा पद्य है; यह श्रीमद्भगवद्गीता से संकलित श्लोकों पर आधारित है और इसे उपनिषदों के साररूप में स्वीकार किया गया है।
  2. 02केंद्रीय भाव: प्रकृति के तीन गुण — सत्त्व, रजस् और तमस् — मनुष्य की श्रद्धा, आहार, तप और दान को निर्धारित करते हैं; सात्त्विक गुण अपनाने से मनुष्य श्रेष्ठत्व प्राप्त कर सकता है।
  3. 03श्रद्धा तीन प्रकार की होती है — सात्त्विकी, राजसी और तामसी। सात्त्विक व्यक्ति देवताओं की, राजसी व्यक्ति यक्ष-राक्षसों की और तामसी व्यक्ति प्रेत तथा भूतगणों की पूजा करते हैं।
  4. 04प्रमुख श्लोक (सीधे स्रोत से): 'त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा। सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु॥' — भावार्थ: देहधारियों की श्रद्धा उनके स्वभाव के अनुसार तीन प्रकार की होती है — सात्त्विकी, राजसी और तामसी; इसे सुनो।
  5. 05सात्त्विक आहार का श्लोक: 'आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः। रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥' — भावार्थ: जो आहार आयु, सत्त्व, बल, आरोग्य, सुख-प्रीति को बढ़ाने वाले, रसयुक्त, चिकने, स्थायी और हृदय को प्रिय हों — वे सात्त्विकप्रिय आहार हैं।
  6. 06तप के तीन भेद: शारीरं तप (देव-गुरु-पूजन, शौच, सरलता, ब्रह्मचर्य, अहिंसा), वाचिक तप (सत्य, प्रिय-हितकर वाक्य, स्वाध्याय), मानस तप (मनःप्रसाद, सौम्यता, मौन, आत्मनियंत्रण, भावसंशुद्धि)।
  7. 07कठिन शब्दार्थ — यातयामम्: आधा पका हुआ; अमेध्यम्: अपवित्र, अस्वच्छ; अनुपकारिणे: उपकार न करने वाले को; स्वभावजा: स्वभाव से उत्पन्न।
Questions

Frequently asked questions

01

सत्त्वमाहो रजस्तमः पाठ किस ग्रन्थ से लिया गया है?

यह पाठ श्रीमद्भगवद्गीता से संकलित श्लोकों पर आधारित है। पाठ की भूमिका में कहा गया है कि गीता का उपदेश सार्वभौमिक और सार्वकालिक है तथा इसे उपनिषदों के साररूप में स्वीकार किया गया है।

02

Sattvamaho Rajastamah mein shraddha ke kitne prakar bataaye gaye hain?

इस पाठ में श्रद्धा के तीन प्रकार बताए गए हैं — सात्त्विकी, राजसी और तामसी। पाठ के अनुसार प्रत्येक देहधारी की श्रद्धा उसके स्वभाव के अनुसार होती है और जिसकी जैसी श्रद्धा है, वह वैसा ही है।

03

सात्त्विक, राजस और तामस आहार में क्या अंतर है?

पाठ के अनुसार सात्त्विक आहार रसयुक्त, चिकना, स्थायी और आयु-बल-आरोग्य बढ़ाने वाला होता है। राजस आहार कड़वा, खट्टा, अत्यंत नमकयुक्त, तीखा और दुःख-शोक देने वाला होता है। तामस आहार बासी (पर्युषित), रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, अपवित्र और जूठा होता है।

04

शारीरं तप किसे कहते हैं?

पाठ के अनुसार देवता, ब्राह्मण, गुरु और विद्वानों का पूजन, पवित्रता (शौच), सरलता (आर्जव), ब्रह्मचर्य और अहिंसा — ये शारीरं तप कहलाते हैं।

05

वाचिक तप क्या होता है?

पाठ के अनुसार अनुद्वेगकर (उत्तेजित न करने वाला), सत्य, प्रिय और हितकर वाक्य बोलना तथा स्वाध्याय और अभ्यास करना — वाचिक तप कहलाता है।

06

मानस तप की परिभाषा क्या है?

पाठ के अनुसार मनःप्रसाद (मन की शांति), सौम्यता, मौन, आत्मनियंत्रण (आत्मविनिग्रह) और भावसंशुद्धि — ये मानस तप कहलाते हैं।

07

सात्त्विक दान कौन-सा होता है?

पाठ के अनुसार जो दान केवल 'देना चाहिए' इस भावना से, प्रत्युपकार की अपेक्षा किए बिना, उचित देश-काल और उचित पात्र को दिया जाए — वह सात्त्विक दान कहलाता है।

08

तामस दान की क्या विशेषता है?

पाठ के अनुसार जो दान अनुचित देश-काल में, अपात्र व्यक्तियों को, बिना सम्मान के और अवज्ञापूर्वक दिया जाए — वह तामस दान कहलाता है।

09

राजसी श्रद्धा वाले लोग किसकी पूजा करते हैं?

पाठ के अनुसार राजसी श्रद्धा वाले लोग यक्षों और राक्षसों की पूजा करते हैं। सात्त्विक लोग देवताओं की और तामसी लोग प्रेत तथा भूतगणों की पूजा करते हैं।

10

Sattvamaho Rajastamah ka kendriya sandesh kya hai?

इस पाठ का केंद्रीय संदेश है कि प्रकृति के तीन गुण — सत्त्व, रजस् और तमस् — मनुष्य की श्रद्धा, आहार, तप और दान को प्रभावित करते हैं। पाठ की भूमिका में बताया गया है कि गीता के उपदेश का अनुसरण कर मनुष्य देवत्व (श्रेष्ठत्व) को प्राप्त कर सकता है।

11

सात्त्विक तप और राजस तप में क्या अंतर है?

पाठ के अनुसार फलाकांक्षा से रहित होकर, परम श्रद्धा से किया गया तप सात्त्विक तप कहलाता है। जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिए अथवा दम्भपूर्वक किया जाए — वह राजस तप है, जो अस्थायी (चल और अध्रुव) होता है।

12

क्या इस पाठ का PDF मुफ़्त डाउनलोड कर सकते हैं?

हाँ, यह मुफ़्त है, बिना साइन-अप।

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