SanskritClass 11

Shashwati

Sanskrit Textbook11 Chapters

Chapter notes

What you'll learn in Shashwati

A quick revision map of Shashwati — the core idea and five key takeaways from each chapter. Tap any chapter to read the full NCERT PDF and detailed notes.

01

Vedamritam

NCERT Class 11 Sanskrit Shashwati Vedamritam — यह पाठ ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद से संकलित छह वैदिक मंत्रों का पद्य-संग्रह है, जो संगठन, मानसिक एकता, प्रकृति-माधुर्य, शिवसंकल्प और मातृभूमि-स्तुति के उदात्त आदर्श प्रस्तुत करता है। इस पाठ का कोई एक लेखक नहीं है — मंत्र सीधे वेदों से लिए गए हैं।

  • 1पाठ का स्रोत एवं विधा: यह तीन वेदों — ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद — से चुने गए छह मंत्रों का पद्य-संग्रह है; कोई एक कवि या लेखक नहीं।
  • 2केंद्रीय भाव: विश्वशान्ति, विश्वबन्धुत्व, एकता, निर्भयता, प्रकृति की मधुरता और राष्ट्रप्रेम — ये वैदिक काव्य के मूल संदेश हैं जो पाठ्यपुस्तक के आमुख में स्पष्ट रेखांकित हैं।
  • 3ऋग्वेद (10-191) के दो मंत्रों में समाज को एकजुट होकर चलने, परस्पर विरोध छोड़कर एक स्वर में बोलने और हृदय-आकूति-मन को समान रखने का आह्वान है — जैसे पूर्वकाल के देवता एकमत होकर हवि ग्रहण करते थे।
  • 4प्रमुख श्लोक (ऋग्वेद 1-90-7): «मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥» — भावार्थ: यजमान के लिए वायु मधुर बहे, नदियाँ और समुद्र मधुर प्रवाहित हों, हमारी ओषधियाँ भी मधुरता-युक्त हों।
  • 5प्रमुख श्लोक (यजुर्वेद 36-24): «पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतम्। शृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतम् अदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्॥» — भावार्थ: हम सौ वर्ष देखें, जिएँ, सुनें, बोलें और दीनता-रहित रहें — बार-बार सौ वर्षों से भी अधिक।
02

Paropakaraya Satam Vibhutayah

NCERT Class 11 Sanskrit Shashwati Paropakaraya Satam Vibhutayah — यह शाश्वती पाठ्यपुस्तक का द्वितीय पाठ है, जो आर्यशूर-रचित जातकमाला ग्रन्थ के पन्द्रहवें जातक 'मत्स्यजातकम्' का गद्य-पद्य मिश्रित संस्कृत में संक्षेप है।

  • 1पाठ का स्रोत: आर्यशूर-रचित 'जातकमाला' ग्रन्थ का पन्द्रहवाँ जातक 'मत्स्यजातकम्'; विधा — गद्य-पद्य मिश्रित संस्कृत।
  • 2मूल जातक कथाएँ पालि भाषा में हैं (संख्या 547); जातकमाला उन्हीं से प्रेरणा लेकर आर्यशूर की रचना है।
  • 3केंद्रीय भाव: सत्य-तपोबल के आधार पर बोधिसत्त्व ने मत्स्याधिपति के रूप में साथी मत्स्यों की प्राण रक्षा की; सत्त्वगुण से परिपूर्ण आचरण देवताओं को भी वश में कर सकता है।
  • 4मुख्य पात्र: बोधिसत्त्व (मत्स्याधिपति), देवराज इन्द्र (शक्र)। घटना-क्रम: वर्षाहीनता → सरोवर का सूखना → मत्स्यों का संकट → सत्यवाक्य → अकाल में वर्षा → इन्द्र का साक्षात् आगमन।
  • 5प्रमुख श्लोक (योग्यताविस्तारः, पाठ की शीर्षक-पंक्ति का स्रोत): 'पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः / स्वयं न खादन्ति फलन्ति वृक्षाः। / धाराधरो वर्षति नात्महेतोः / परोपकाराय सतां विभूतयः ॥' — भावार्थ: नदियाँ, वृक्ष और बादल स्वयं के लिए नहीं, दूसरों के उपकार के लिए होते हैं — सज्जनों की विभूतियाँ परोपकार के लिए ही होती हैं।
03

Mano Hi Mahatam Dhanam

NCERT Class 11 Sanskrit Shashwati Mano Hi Mahatam Dhanam पाठ महाभारत के उद्योग पर्व (अध्याय 131 और 134) से संकलित श्लोकों पर आधारित है। महर्षि वेदव्यास की इस पद्य-रचना में वीरमाता विदुरा अपने पराजित पुत्र को स्वाभिमान एवं क्षात्र-धर्म का उपदेश देती हैं।

  • 1पाठ का स्रोत एवं विधा: यह पाठ महर्षि वेदव्यास रचित महाभारत के उद्योग पर्व के अध्याय 131 और 134 से संकलित है; यह पद्य (श्लोक) विधा में रचित है।
  • 2केंद्रीय भाव: 'मानो हि महतां धनम्' — मान (स्वाभिमान) ही महान पुरुषों का सबसे बड़ा धन है; कायरता और आत्मसम्मान-हीनता सबसे बड़ी दरिद्रता है।
  • 3मुख्य पात्र एवं घटना: विदुरा (वीरमाता) सिन्धुराज से पराजित और निराश पुत्र को उठकर शत्रु से लड़ने या वीरगति पाने का उपदेश देती हैं; कुन्ती इस पुरातन प्रसंग की प्रस्तुतकर्त्री हैं।
  • 4प्रमुख श्लोक (श्लोक 1): "क्षात्रधर्मरता धन्या विदुरा दीर्घदर्शिनी। विश्रुता राजसंसत्सु श्रुतवाक्या बहुश्रुता॥" — भावार्थ: विदुरा क्षात्र-धर्म में निरत, दूरदर्शिनी और राजसभाओं में प्रसिद्ध विदुषी नारी थीं।
  • 5प्रमुख श्लोक (श्लोक 7): "य आत्मनः प्रियसुखे हित्वा मृगयते श्रियम्। अमात्यानामथो हर्षमादधात्यचिरेण सः॥" — भावार्थ: जो व्यक्ति अपने सुख-आराम को छोड़कर ऐश्वर्य की खोज करता है, वह शीघ्र ही अपने साथियों को भी आनंदित करता है।
04

Sauvarnshakatika

NCERT Class 11 Sanskrit Shashwati Sauvarnshakatika — यह पाठ महाकवि शूद्रक-प्रणीत संस्कृत नाटक 'मृच्छकटिक' के छठे अंक से लिया गया गद्य-नाट्यांश है, जिसमें गणिका वसन्तसेना की वात्सल्यमयी उदारता और बालक रोहसेन की मार्मिक जिद का हृदयस्पर्शी चित्रण है।

  • 1यह पाठ महाकवि शूद्रक-प्रणीत संस्कृत नाटक 'मृच्छकटिक' (प्रकरण विधा) के छठे अंक से लिया गया गद्य-नाट्यांश है; मृच्छकटिक तत्कालीन समाज का दर्पण माना जाता है।
  • 2मुख्य पात्र: रोहसेन (आर्यचारुदत्त का पुत्र), रदनिका (दासी), वसन्तसेना (उज्जयिनी की गणिका)।
  • 3केंद्रीय भाव: बाल-मन की सहज इच्छा और वसन्तसेना की वात्सल्यमयी उदारता — उसने बिना संकोच अपने सारे आभूषण बालक को दे दिए।
  • 4उल्लेखनीय संवाद — वसन्तसेना रोहसेन को देखकर कहती है: 'अनलघ्कृत-शरीरोऽपि चन्द्रमुख आनन्दयति मम हृदयम्' — बिना आभूषण के भी यह चंद्रमुख बालक मेरा हृदय प्रसन्न करता है।
  • 5वसन्तसेना भाग्य की विडंबना व्यक्त करती है: 'पुष्करपत्रपतितजलबिन्दुसदृशैः क्रीडसि त्वं पुरुषभागधेयैः' — हे भगवन्, तुम मनुष्यों के भाग्य से कमलपत्र पर गिरी जल-बूँद के समान खेलते हो।
05

Aharavicharah

NCERT Class 11 Sanskrit Shashwati Aharavicharah पाठ संस्कृत गद्य में है, जो चरकसंहिता के 'विमानस्थानम्' प्रकरण के 'रसविमान' नामक प्रथम अध्याय से संकलित है। इसमें स्वस्थ जीवन के लिए उचित आहार-विचार के नौ व्यावहारिक नियमों का विवेचन किया गया है।

  • 1विधा एवं स्रोत: यह पाठ संस्कृत गद्य (prose) में है, जो चरकसंहिता के 'विमानस्थानम्' प्रकरण के 'रसविमान' नामक प्रथम अध्याय से लिया गया है।
  • 2केंद्रीय भाव: स्वास्थ्य का मूल आधार समुचित आहार है; भोजन के प्रकार, उसकी मात्रा और उचित समय का पालन करना आवश्यक है।
  • 3उष्ण भोजन (उष्णमश्नीयात्): गर्म भोजन करने से पेट की अग्नि जागती है, भोजन शीघ्र पचता है, वात अनुकूल होता है और कफ दूर होता है।
  • 4स्निग्ध भोजन (स्निग्धमश्नीयात्): घृत-तेल से युक्त भोजन शरीर की वृद्धि करता है, इंद्रियों को दृढ़ बनाता है, बल बढ़ाता है और वर्ण में निखार लाता है ('वर्णप्रसादं चाभिनिर्वर्तयति')।
  • 5मात्रावत् एवं जीर्णे भोजन: उचित मात्रा में किया भोजन वात-पित्त-कफ को पीड़ित नहीं करता और आयु बढ़ाता है; पूर्व भोजन के बिना पचे नया खाने से सभी दोष शीघ्र बढ़ते हैं।
06

Santatiprabodhanam

NCERT Class 11 Sanskrit Shashwati Santatiprabodhanam — यह पाठ महर्षि अरविन्द द्वारा संस्कृत में प्रणीत खण्डकाव्य 'भवानी भारती' से संकलित एक ओजस्वी पद्य-पाठ है, जिसमें भारतमाता अपनी संततियों को परतंत्रता और अज्ञान के बंधन से मुक्त होने हेतु जागृत करती है।

  • 1विधा एवं स्रोत: यह पद्य-पाठ है — महर्षि अरविन्द द्वारा संस्कृत में रचित खण्डकाव्य 'भवानी भारती' से संकलित; पाठ में कुल 8 श्लोक हैं।
  • 2रचना का संदर्भ: कवि अरविन्द घोष 1906 ई. में अलीपुर कारागार में बंदी थे; उसी अवधि में स्वप्न में बंदिनी भारतमाता के दर्शन से भावाविष्ट होकर यह ओजस्वी राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत शतककाव्य रचा गया।
  • 3भारतमाता के रूप: इस काव्य में महाकवि अरविन्द ने भारतमाता को महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती के तीन रूपों में निरूपित किया है।
  • 4केंद्रीय भाव: भारतमाता अपनी संततियों को उनके पूर्वजों के पराक्रम की याद दिलाती है — वे ब्रह्मचर्य से विशुद्धवीर्य और ज्ञान-तप से श्रेष्ठ थे — और निद्रा त्याग कर राष्ट्र-मुक्ति के लिए युद्ध हेतु प्रेरित करती है।
  • 5प्रमुख श्लोक (श्लोक 2 का अंतिम चरण — verbatim): 'उत्तिष्ठतोत्तिष्ठत सुप्तसिंहाः' — भाव: हे सोये हुए सिंहों, उठो-उठो; अर्थात् भारत के वीर पुत्र अब जागें और अपनी शक्ति पहचानें।
07

Vidnyananaukaa

NCERT Class 11 Sanskrit Shashwati Vidnyananaukaa — यह पाठ प्रो. श्रीनिवास रथ द्वारा रचित आधुनिक संस्कृत गीतिका है, जो उनके काव्य-संग्रह 'तदेव গগनं सैव धरा' से ली गई है।

  • 1विधा एवं स्रोत: यह आधुनिक संस्कृत गीतिका है, जो प्रो. श्रीनिवास रथ के काव्य-संग्रह 'तदेव গগनं सैव धरा' से ली गई है; संग्रह हिन्दी अनुवाद के साथ प्रकाशित है।
  • 2कवि-परिचय: प्रो. श्रीनिवास रथ का जन्म 1933 में पुरी (उड़ीसा) में हुआ; उन्होंने अपने पिता से पारंपरिक पद्धति द्वारा संस्कृत सीखी, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से उच्चशिक्षा ली, और विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में संस्कृत विभागाध्यक्ष रहे।
  • 3केंद्रीय भाव: यांत्रिकता और कृत्रिमता के प्रति बढ़ते मोह में जीवन-मूल्यों को नहीं भुलाना चाहिए — विज्ञान की नाव आ रही है, पर ज्ञान की गंगा लुप्त होती जा रही है।
  • 4प्रमुख श्लोक: 'संस्कृतोद्यानदूर्वा दरिद्रीकृता / निष्कुटेषु स्वयं कण्टकिन्याहिता। / पुष्पितानां लतानां न रक्षा कृता / विस्तृता वाटिकायोजना निर्मिता॥' — भावार्थ: संस्कृति-उद्यान की दूब दरिद्र हो गई, उद्यानों में नागफनी लगाई जा रही है, फूलती लताओं की रक्षा नहीं की गई, किंतु विशाल बगीचे बनाने की योजनाएँ बन रही हैं।
  • 5प्रमुख श्लोक: 'वर्तमानस्थितिर्मानवानां कृते / प्रत्यहं दुर्निमित्तैव संलक्ष्यते। / यत्र कुत्रपि शान्तिः समुद्वीक्ष्यते / तत्र विध्वंसबीजं समायोज्यते॥' — भावार्थ: मनुष्यों की वर्तमान दशा प्रतिदिन अशुभ दिखती है; जहाँ भी शांति दिखती है, वहाँ विनाश का बीज बो दिया जाता है।
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Kanthamaanikyam

NCERT Class 11 Sanskrit Shashwati Kanthamaanikyam (कन्थामाणिक्यम्) आधुनिककाल के प्रतिष्ठित संस्कृत साहित्यकार अभिराज राजेन्द्रमिश्र के एकांकी-संग्रह 'रूपरुद्रीयम्' से संकलित एक संस्कृत गद्य-नाटिका है, जो वर्ग-भेद को नकारते हुए सच्ची मित्रता और मानवीय गुण की श्रेष्ठता का संदेश देती है।

  • 1यह पाठ आधुनिककाल के प्रतिष्ठित संस्कृत साहित्यकार अभिराज राजेन्द्रमिश्र के एकांकी-संग्रह 'रूपरुद्रीयम्' से संकलित एक संस्कृत गद्य-एकांकी (नाटिका) है; इसमें दो दृश्य हैं।
  • 2'कन्थामाणिक्यम्' का अर्थ है—जीर्णवस्त्रेषु रत्नम् अर्थात् गुदड़ी का लाल; यह शीर्षक सोमधर के छिपे हुए गुण का प्रतीक है।
  • 3मुख्य पात्र: भवानीदत्त (उच्चन्यायालय के वकील, वर्गभेद से ग्रस्त), रत्ना (उनकी विवेकशील पत्नी), सिन्धु (पुत्र) और सोमधर (सब्जी-फल विक्रेता का पुत्र, मेधावी एवं निःस्वार्थ मित्र)।
  • 4केंद्रीय शिक्षा: भवानीदत्त स्वयं अंत में कहते हैं—'गुणवन्त एव सभ्याः धनिकाः सम्माननीयाश्च'—गुणवान व्यक्ति ही सभ्य, धनी और सम्माननीय है।
  • 5सूक्ति (पाठ के योग्यताविस्तारः से, verbatim): 'आपत्सु मित्रं जानीयात्।' — विपत्ति में ही सच्चे मित्र की पहचान होती है।
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Ishah Kutrasti

NCERT Class 11 Sanskrit Shashwati Ishah Kutrasti (ईशः कुत्रस्ति) यह पाठ नोबेल पुरस्कार विजेता रवीन्द्रनाथ टैगोर की विश्वविख्यात कृति 'गीतांजलि' के संस्कृत अनुवाद से संकलित एक काव्य-पाठ है, जिसके अनुवादक कोल-व्यासराय शास्त्री हैं।

  • 1पाठ का स्रोत: यह पाठ रवीन्द्रनाथ टैगोर की विश्वविख्यात कृति 'गीतांजलि' के संस्कृत अनुवाद से संकलित है; अनुवादक कोल-व्यासराय शास्त्री हैं।
  • 2विधा: पद्य (काव्य) — शाश्वती का नवमः पाठः।
  • 3केंद्रीय भाव: ईश्वर बंद मंदिरों में नहीं, खेत-खलिहान और कर्मक्षेत्र में श्रमिकों के बीच हैं; सच्ची भक्ति श्रम-सेवा में है।
  • 4प्रमुख श्लोक (verbatim): 'देवागारे पिहितद्वारे / तमोवृतेऽस्मिन् भजसे कम् ? / त्यज जपमालां त्यज तव गानं / नास्त्यत्रेशः स्फुटय दृशम्॥' — भावार्थ: बंद द्वार वाले अंधकारयुक्त देवमंदिर में तुम किसकी आराधना कर रहे हो? यहाँ ईश्वर नहीं है, आँखें खोलो।
  • 5दूसरे श्लोक में कवि कहते हैं — ईश्वर वहाँ है जहाँ लाङ्गलिक (हलवाहा) कठिन भूमि जोत रहा है और जनपद की सड़क बनाने वाला पत्थर के टुकड़े तोड़ रहा है।
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Sattvamaho Rajastamah

NCERT Class 11 Sanskrit Shashwati Sattvamaho Rajastamah यह श्रीमद्भगवद्गीता से संकलित पद्य-पाठ है, जिसमें जीवों की स्वभावजन्य श्रद्धा तथा सत्त्व, रजस् एवं तमः — इन तीन गुणों के आधार पर आहार, तप और दान के त्रिविध भेदों का वर्णन किया गया है।

  • 1पाठ की विधा पद्य है; यह श्रीमद्भगवद्गीता से संकलित श्लोकों पर आधारित है और इसे उपनिषदों के साररूप में स्वीकार किया गया है।
  • 2केंद्रीय भाव: प्रकृति के तीन गुण — सत्त्व, रजस् और तमस् — मनुष्य की श्रद्धा, आहार, तप और दान को निर्धारित करते हैं; सात्त्विक गुण अपनाने से मनुष्य श्रेष्ठत्व प्राप्त कर सकता है।
  • 3श्रद्धा तीन प्रकार की होती है — सात्त्विकी, राजसी और तामसी। सात्त्विक व्यक्ति देवताओं की, राजसी व्यक्ति यक्ष-राक्षसों की और तामसी व्यक्ति प्रेत तथा भूतगणों की पूजा करते हैं।
  • 4प्रमुख श्लोक (सीधे स्रोत से): 'त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा। सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु॥' — भावार्थ: देहधारियों की श्रद्धा उनके स्वभाव के अनुसार तीन प्रकार की होती है — सात्त्विकी, राजसी और तामसी; इसे सुनो।
  • 5सात्त्विक आहार का श्लोक: 'आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः। रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥' — भावार्थ: जो आहार आयु, सत्त्व, बल, आरोग्य, सुख-प्रीति को बढ़ाने वाले, रसयुक्त, चिकने, स्थायी और हृदय को प्रिय हों — वे सात्त्विकप्रिय आहार हैं।
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Navadravyani

NCERT Class 11 Sanskrit Shashwati Navadravyani यह पाठ 17वीं शताब्दी के विद्वान अन्नम्भट्ट द्वारा रचित 'तर्कसंग्रह' ग्रन्थ से लिया गया संस्कृत गद्य-सूत्र पाठ है, जो वैशेषिक दर्शन के नौ द्रव्यों — पृथिवी, जल, तेजस्, वायु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा और मनस् — का तार्किक परिचय देता है।

  • 1पाठ का स्रोत एवं लेखक: यह पाठ अन्नम्भट्ट रचित 'तर्कसंग्रह' से लिया गया है; रचयिता का समय 17वीं शताब्दी है।
  • 2विधा: संस्कृत गद्य-सूत्र शैली; 'तर्कसंग्रह' न्याय और वैशेषिक दर्शन के प्रवेश की कुंजी मानी जाती है।
  • 3नव द्रव्य: पृथिवी, अप् (जल), तेजस् (अग्नि), वायु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा और मनस् — ये नौ द्रव्य हैं।
  • 4सप्त पदार्थ: द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय और अभाव — इन्हीं में समग्र विश्व का ज्ञान समाहित है।
  • 5केंद्रीय भाव: स्रोत के अनुसार — 'द्रव्यादि सप्त पदार्थों के ज्ञान से लोकसिद्धि होकर निःश्रेयस अर्थात् मोक्ष प्राप्ति होती है।'

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