Summary
'Alpanamapi vastunam samhatih karyasadhika' is Chapter 2 of Class 8 Sanskrit textbook Deepakam, a story from Hitopadesha's Mitralabha section about pigeons and a mouse-king that teaches the power of unity. यह पाठ हितोपदेश की मित्रलाभ-प्रकरण की कथा है जो सिखाती है कि छोटी-से-छोटी शक्तियाँ भी जब एकजुट होकर काम करें तो बड़े-से-बड़ा लक्ष्य सिद्ध हो सकता है।
इस पाठ में दो स्तरों की कथा है। बाहरी संवाद में कुछ मित्र उत्तराखण्ड में केदारनाथ यात्रा के दौरान वर्षा, सेतु-भंग और पर्वत-स्खलन के संकट में फँसते हैं। नायक उनका साहस बढ़ाने के लिए हितोपदेश की कथा सुनाता है जिसमें कपोतराज चित्रग्रीव और उसके साथी शिकारी के जाल में फँसते हैं, किन्तु एकचित्त होकर जाल उठाकर उड़ जाते हैं और मूषकराज हिरण्यक की सहायता से मुक्त होते हैं। पाठ में ल्यप्-प्रत्यय और विसर्गसन्धि के नियम भी उदाहरण सहित दिए गए हैं।
Key points & formulas
- 01कथावस्तु (बाहरी): कुछ मित्र ग्रीष्मावकाश में उत्तराखण्ड के गौरीकुण्ड से केदारक्षेत्र चढ़ रहे थे; वर्षारम्भ में तेज बारिश, सेतु-भंग और पर्वत-स्खलन हो गया। सभी भयभीत हुए, किन्तु नायक ने धैर्य रखा और हितोपदेश की कथा सुनाई।
- 02आन्तरिक कथा (हितोपदेश, मित्रलाभप्रकरण): गोदावरी तट के शाल्मली वृक्ष पर रहने वाले कपोतराज चित्रग्रीव और उसके साथी आकाश में उड़ रहे थे। शिकारी ने निर्जन वन में तण्डुलकण (चावल के दाने) बिखेरकर जाल फैलाया। चित्रग्रीव के सावधान करने पर भी लोभवश कपोत उतरे और जाल में फँस गए।
- 03केंद्रीय शिक्षा (नीतिवचन): 'अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका' — चित्रग्रीव ने सभी को समझाया कि एकचित्त होकर सब मिलकर जाल उठाकर उड़ें। सभी पक्षियों ने ऐसा ही किया, व्याध उन्हें पकड़ न सका। एकता से असम्भव कार्य भी सिद्ध होता है।
- 04प्रमुख पात्र: चित्रग्रीव (कपोतराज — नायकधर्म और आश्रितवात्सल्य का प्रतीक), हिरण्यक (मूषकराज — चित्रग्रीव का प्रिय मित्र जो दाँत से बन्धन काटता है), व्याधः (शिकारी — प्रतिकूल पात्र), नायकः (छात्र-मित्रों का नेता जो कथा सुनाता है)।
- 05महत्त्वपूर्ण श्लोक: 'विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा, सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः। यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ॥' — विपत्ति में धैर्य, समृद्धि में क्षमा, सभा में वाक्पटुता — ये महापुरुषों के स्वाभाविक गुण हैं।
- 06कठिन शब्द: व्याधः = शिकारी; तण्डुलकणान् = चावल के दानों को; एकचित्तीभूय = एक मन होकर; कापुरुषलक्षणम् = कायर पुरुष का चिह्न; आश्रितवात्सल्येन = शरण में आए लोगों के प्रति स्नेह से; प्रतीकारः = उपाय।
- 07व्याकरण: पाठ में ल्यप्-प्रत्यय के नियम (उपसर्गयुक्त धातु के साथ क्त्वा के स्थान पर ल्यप्, केवल 'य' अवशेष) और विसर्गसन्धि के चार नियम उदाहरण-तालिका सहित दिए गए हैं।
Frequently asked questions
01alpanamapi vastunam samhatih karyasadhika paath ka arth kya hai?
इस नीतिवचन का अर्थ है — छोटी-से-छोटी वस्तुओं की एकता भी कार्य को सिद्ध कर देती है। जैसे घास के तिनकों से बनी रस्सी से मदमत्त हाथी भी बाँधे जाते हैं, वैसे ही संगठित प्रयास से बड़ी-से-बड़ी बाधा पार की जा सकती है।
02चित्रग्रीव कौन था?
चित्रग्रीव एक कपोतराज (कबूतरों का राजा) था जो अपने परिवार सहित गोदावरी तट के शाल्मली वृक्ष पर रहता था। वह बुद्धिमान, धैर्यवान और अपने साथियों का हितैषी नायक था।
03चित्रग्रीव ने कपोतों को निर्जन वन में क्या सावधानी दी?
चित्रग्रीव ने कपोतों से कहा — 'निर्जन वन में तण्डुलकणों का होना संदिग्ध है, कोई व्याध (शिकारी) यहाँ हो सकता है। अविचारितं कर्म न कर्तव्यम् — बिना सोचे कोई कार्य नहीं करना चाहिए।' किन्तु कपोतों ने उसकी बात नहीं मानी और जाल में फँस गए।
04कपोत जाल से कैसे मुक्त हुए?
चित्रग्रीव ने सभी कपोतों को समझाया कि एकचित्त होकर सभी मिलकर जाल उठाकर उड़ें। सभी पक्षियों ने एक साथ जाल उठाकर आकाशमार्ग से उड़ान भरी और व्याध की दृष्टि से दूर निकल गए। फिर मूषकराज हिरण्यक ने अपने दाँतों से उनके बन्धन काट दिए।
05हिरण्यक कौन था और उसने क्या किया?
हिरण्यक एक मूषकराज (चूहों का राजा) था जो गण्डकी नदी के तट पर चित्रवन में रहता था। वह चित्रग्रीव का प्रिय मित्र था। उसने अपने दाँत की शक्ति से सभी कपोतों के बन्धन काट दिए।
06चित्रग्रीव ने हिरण्यक से पहले किसके बन्धन कटवाने को कहा?
चित्रग्रीव ने हिरण्यक से कहा — 'पहले मेरे आश्रितों (साथी कपोतों) के बन्धन काटो, मेरे बाद में।' इससे उसके नायकधर्म और आश्रितवात्सल्य का प्रमाण मिलता है। हिरण्यक ने प्रसन्नतापूर्वक यह कार्य किया।
07यह कथा किस ग्रन्थ से ली गई है और उसके लेखक कौन हैं?
यह कथा हितोपदेश ग्रन्थ के मित्रलाभ-प्रकरण से ली गई है। इस ग्रन्थ के लेखक पण्डित नारायणशर्मा हैं। हितोपदेश में चार प्रकरण हैं — मित्रलाभ, सुहृद्भेद, विग्रह और सन्धि।
08'विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा' श्लोक का क्या अर्थ है?
इस श्लोक का भावार्थ है — महापुरुषों के स्वाभाविक गुण हैं: विपत्ति में धैर्य, उन्नति में क्षमा, सभा में वाक्पटुता, युद्ध में शौर्य, यश के प्रति अभिरुचि और शास्त्र-श्रवण में अनुराग। ये गुण महात्माओं के प्रकृतिसिद्ध (स्वाभाविक) होते हैं।
09ल्यप्-प्रत्यय क्या होता है और पाठ में इसके कौन-से उदाहरण हैं?
जब किसी धातु से पहले उपसर्ग (जैसे आ, वि, अव, उप, प्र आदि) लगा हो और वह क्रिया पूर्वकालिक हो, तो क्त्वा-प्रत्यय के स्थान पर ल्यप् लगता है; केवल 'य' अवशेष रहता है। पाठ से उदाहरण: अव + लोक् + ल्यप् = अवलोक्य; अव + लम्ब् + ल्यप् = अवलम्ब्य; आ + गम् + ल्यप् = आगत्य।
10विसर्गसन्धि के पाठ में कौन-से नियम बताए गए हैं?
पाठ में चार नियम हैं: (१) विसर्ग के बाद च/छ हो तो विसर्ग → श (कः + चित् = कश्चित्); (२) विसर्ग के बाद त/थ हो तो विसर्ग → स (चकितः + तूष्णीम् = चकितस्तूष्णीम्); (३) अकार-विसर्ग (अः) के बाद वर्ग के तीसरे-चौथे-पाँचवें वर्ण या ह य व र ल हों तो अः → ओ (हिरण्यकः + नाम = हिरण्यको नाम); (४) अकार-विसर्ग के बाद भी अकार हो तो दोनों मिलकर ओ हो जाते हैं (कुतः + अत्र = कुतोऽत्र)।
11उत्तराखण्ड यात्रा में मित्रों के सामने क्या संकट आया?
मित्र गौरीकुण्ड से केदारक्षेत्र चढ़ रहे थे, तभी वर्षारम्भ में तेज वर्षा शुरू हुई, चारों ओर अन्धकार छा गया, नदी के तीव्र जलवेग से सेतु टूट गया और पर्वत-स्खलन हो गया। सभी भयभीत होकर ईश्वर से प्रार्थना करने लगे। तब नायक ने धैर्य रखते हुए सबको प्रेरित किया।
12पाठ की मुख्य शिक्षा क्या है?
पाठ की मुख्य शिक्षा है — संगठन (एकता) में शक्ति होती है। जैसे कपोतों ने बुद्धिबल और संघटन-सामर्थ्य से अपनी रक्षा की, वैसे ही मनुष्य भी विपत्ति में धैर्य और एकजुटता से किसी भी संकट को पार कर सकते हैं।
13क्या यह अध्याय की PDF मुफ़्त है?
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