Summary
"Ishavasyam Idam Sarvam" is a Sanskrit play (natak) in Class 7 Deepakam that dramatises the story of Prahlada, Hiranyakashipu, Holika, and the Narasimha avatar. यह पाठ इस सत्य का संदेश देता है कि ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है — 'ईशावास्यमिदं सर्वम्' — देवालय में ही नहीं, वृक्ष, शिला और स्तम्भ तक में।
यह पाठ एक नाटक के रूप में प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु की कथा प्रस्तुत करता है। दैत्यराज हिरण्यकशिपु स्वयं को सर्वशक्तिमान मानता है और विष्णुभक्त पुत्र प्रह्लाद को मारने के अनेक प्रयास करता है — हाथी से कुचलवाना, पर्वत से गिराना, समुद्र में फेंकना। होलिका अग्नि में प्रह्लाद को जलाने का प्रयास करती है, किन्तु नारायण की कृपा से प्रह्लाद बच जाता है और होलिका स्वयं जल जाती है। अन्त में नृसिंह स्तम्भ से प्रकट होकर हिरण्यकशिपु का वध करते हैं, जिससे सिद्ध होता है कि ईश्वर सर्वत्र विद्यमान है। पाठ में तृतीया विभक्ति और लृट् लकार के रूप भी सिखाए गए हैं।
Key points & formulas
- 01पाठ का विषय: यह एक नाटक है जो प्रह्लाद, हिरण्यकशिपु, होलिका और नृसिंहावतार की कथा पर आधारित है; कक्षा के छात्र-छात्राएँ इसका अभिनय भी करते हैं।
- 02केंद्रीय शिक्षा (नैतिक सन्देश): 'ईशावास्यमिदं सर्वम्' — ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है; प्रह्लाद ने यह सत्य सिद्ध किया कि हरि देवालय, वृक्ष, शिला और स्तम्भ — सब में हैं।
- 03प्रमुख पात्र: हिरण्यकशिपु (दैत्यराज), प्रह्लाद (विष्णुभक्त पुत्र), होलिका (हिरण्यकशिपु की बहन), नृसिंह (विष्णु-अवतार), मन्त्री, सेनापति, दैत्यपुरोहित।
- 04व्याकरण — तृतीया विभक्ति: (क) उपकरण/साधन के लिए (जैसे खड्गेन स्तम्भं भञ्जयति), (ख) क्रियाविशेषण-स्वभाव के लिए (जैसे क्रोधेन गर्जति); पुल्लिंग, स्त्रीलिंग, नपुंसकलिंग तीनों की पूर्ण तालिका दी गई है।
- 05व्याकरण — लृट् लकार (भविष्यत् काल): पठ् धातु के सभी पुरुष-वचन के रूप (पठिष्यति, पठिष्यतः, पठिष्यन्ति; पठिष्यसि; पठिष्यामि आदि) पाठ में दिए गए हैं।
- 06कठिन शब्द: ईशावास्यम् = ईश्वर से व्याप्त; अहर्निशम् = दिन-रात; पितृष्वसः = हे बुआ (पिता की बहन); देहल्याम् = देहरी में; निजनखैः = अपने नाखूनों से।
- 07योग्यताविस्तर: यह कथा नृसिंह पुराण और श्रीमद्भागवत पुराण में वर्णित है (रचयिता: महर्षि वेदव्यास); बिहार के पूर्णिया जिले के बनमनखी ग्राम का माणिक्य-स्तम्भ इस घटनास्थल से जोड़ा जाता है; होलिकोत्सव की परम्परा इसी कथा से मानी जाती है।
Frequently asked questions
01Ishavasyam idam sarvam chapter ka arth kya hai?
'ईशावास्यमिदं सर्वम्' का अर्थ है — 'यह समस्त जगत् ईश्वर से व्याप्त है।' अर्थात् ईश्वर सर्वत्र विद्यमान है — केवल मन्दिर में नहीं, बल्कि वृक्ष, पत्थर, स्तम्भ और प्रत्येक वस्तु में।
02इस नाटक के प्रमुख पात्र कौन-कौन हैं?
पाठ के प्रमुख पात्र हैं — दैत्यराज हिरण्यकशिपु, उसका विष्णुभक्त पुत्र प्रह्लाद, हिरण्यकशिपु की बहन होलिका, और भगवान् नृसिंह। इसके अतिरिक्त मन्त्री, सेनापति, राजभट और दैत्यपुरोहित भी नाटक में हैं।
03प्रह्लाद को मारने के लिए हिरण्यकशिपु ने क्या-क्या प्रयास किए?
हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को गजस्य पद-दलन (हाथी के पैरों से कुचलवाना), उत्तुंगशिखरात् पातन (ऊँचे पर्वत से गिराना) और रज्ज्वा बद्ध्वा समुद्र में फेंकने जैसे प्रयास किए, तथापि प्रह्लाद जीवित रहा।
04होलिका का क्या हुआ?
होलिका को ब्रह्म के वरप्रसाद से अग्नि न जलाने का वर मिला था। उसने प्रह्लाद को अग्निकुण्ड में जलाने का प्रयास किया, किन्तु उस वर के दुरुपयोग के कारण अग्नि ने होलिका को ही जला दिया और नारायण की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहा।
05नृसिंह कहाँ से प्रकट हुए?
जब हिरण्यकशिपु ने 'हरि स्तम्भ में है' यह सुनकर खड्ग से स्तम्भ पर प्रहार किया, तब महान् गर्जन के साथ नृसिंह उस स्तम्भ से बाहर आए।
06नृसिंह ने हिरण्यकशिपु का वध किस प्रकार किया?
नृसिंह ने हिरण्यकशिपु को सन्ध्याकाल में, राजभवन की देहरी (देहल्याम्) पर — न भीतर न बाहर — अपने निजनखों (नाखूनों) से उसका वक्षःस्थल विदीर्ण करके वध किया।
07तृतीया विभक्ति कब लगती है?
पाठ के अनुसार तृतीया विभक्ति दो स्थितियों में लगती है — (क) उपकरण/साधन के अर्थ में, जैसे 'खड्गेन स्तम्भं भञ्जयति'; (ख) क्रियाविशेषण-स्वभाव वाचक शब्दों में, जैसे 'क्रोधेन गर्जति' और 'आश्चर्येण आह'।
08लृट् लकार क्या है और इसका प्रयोग कब होता है?
लृट् लकार भविष्यत् काल (future tense) के लिए संस्कृत में प्रयुक्त होता है। इस पाठ में पठ् धातु के रूप दिए गए हैं — प्रथमपुरुष एकवचन: पठिष्यति, द्विवचन: पठिष्यतः, बहुवचन: पठिष्यन्ति।
09'अहर्निशम्' का क्या अर्थ है?
पाठ की शब्दार्थ-सूची के अनुसार 'अहर्निशम्' का अर्थ है 'दिन-रात' (अहोरात्र)। पाठ में कहा गया है कि प्रह्लाद अहर्निशं हरेः गुणगान करता था।
10'पितृष्वसः' शब्द का क्या अर्थ है?
पाठ की शब्दार्थ-सूची के अनुसार 'पितृष्वसः' का अर्थ है 'पितुः भगिनि' — अर्थात् पिता की बहन, यानी बुआ। नाटक में प्रह्लाद होलिका को इसी शब्द से सम्बोधित करता है।
11यह कथा किस पुराण में वर्णित है?
पाठ के योग्यताविस्तर खण्ड के अनुसार यह घटना नृसिंह पुराण और श्रीमद्भागवत पुराण में वर्णित है। इन दोनों के रचयिता महर्षि वेदव्यास हैं।
12होलिकोत्सव का सम्बन्ध इस कथा से कैसे है?
पाठ के अनुसार होलिका का दहन बिहार के पूर्णिया जिले में बनमनखी ग्राम में हुआ था। तब से वहाँ के लोग प्रतिवर्ष भस्म और मिट्टी से होलिका क्रीड़ा करते हैं और इसी से भारतवर्ष में होलिकोत्सव मनाने की परम्परा आरम्भ हुई।
13क्या यह अध्याय की PDF मुफ़्त है?
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