SanskritClass 7

Deepakam (दीपकम्)

2026-27 Edition15 Chapters

Chapter notes

What you'll learn in Deepakam (दीपकम्)

A quick revision map of Deepakam (दीपकम्) — the core idea and five key takeaways from each chapter. Tap any chapter to read the full NCERT PDF and detailed notes.

01

वन्दे भारतमातरम्

Vande Bharatamataram (वन्दे भारतमातरम्) is the first chapter of Class 7 Sanskrit textbook Deepakam — a dialogue-based lesson in which a mother explains to her children the meaning and history of 'Vande Mataram', the beauty of Bharat Mata, and the symbolism of the national flag. यह पाठ संवाद-रूप में है जिसमें माँ अपने बच्चों को 'वन्दे मातरम्' गीत का अर्थ, बङ्किमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा उसकी रचना का इतिहास, भारतमाता का सुंदर वर्णन और राष्ट्रध्वज के रंगों का संदेश समझाती है।

  • 1पाठ संवाद-शैली में है — बच्चे माँ से पूछते हैं कि 'वन्दे मातरम्' जो आकाशवाणी और विद्यालय में सुनते हैं, उसका अर्थ क्या है।
  • 2बङ्किमचन्द्रः चट्टोपाध्यायः ने १८८२ में 'आनन्दमठ' उपन्यास लिखा; 'वन्दे मातरम्' गीत उसी उपन्यास में है और संस्कृत एवं बाँग्ला दोनों भाषाओं में है।
  • 3भारतमाता का वर्णन: पर्वतराज हिमालय उनका मुकुट है, रत्नाकर (समुद्र) उनके चरण धोता है; गङ्गा, यमुना, गोदावरी, कावेरी आदि पवित्र नदियाँ और अयोध्या, काशी, द्वारिका जैसे तीर्थक्षेत्र भारतभूमि पर सुशोभित हैं।
  • 4राष्ट्रध्वज के रंगों का संदेश: केशरवर्ण = त्याग और शौर्य ('जयतु सैनिकः'); हरितवर्ण = किसानों का परिश्रम और भूमि की समृद्धि ('जयतु कृषकः'); श्वेतवर्ण = शांति, सत्य और वैज्ञानिकों का यश ('जयतु वैज्ञानिकः')।
  • 5ध्वज के मध्य नीला धर्मचक्र है जिसमें चौबीस (२४) तीलियाँ (अराः) हैं; यह संदेश देता है — कर्तव्यपथ पर निरंतर चलते रहो, जीवन में थकान, आलस्य और प्रमाद का स्थान न हो।
02

नित्यं पिबामः सुभाषितरसम्

Nityam Pibamah Subhashitarasam is the second chapter of Class 7 Sanskrit textbook Deepakam, presenting nine Sanskrit subhashitas (wise sayings) with पदच्छेद, अन्वय and भावार्थ. यह पाठ नौ संस्कृत सुभाषितों के माध्यम से जीवन के नैतिक और सामाजिक मूल्य सिखाता है।

  • 1विषय: पाठ एक संवाद से आरंभ होता है — छात्र सुशीला, रमा और सुरेश विद्यालय की भित्ति पर लिखे सुभाषित का अर्थ जानना चाहते हैं; गुरुजी सुभाषितों की परिभाषा और उनके पठन का लाभ समझाते हैं।
  • 2केंद्रीय शिक्षा: नित्य सुभाषितों का पठन मनुष्य का नैतिक और सामाजिक विकास करता है; यह बताता है कि क्या करणीय है और क्या अकरणीय।
  • 3प्रमुख श्लोक: "आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः । नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ।।" — आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है; परिश्रम ही सच्चा मित्र है।
  • 4नौ सुभाषितों के विषय: (१) पाँच वकारों से सम्मान, (२) छः दोषों का त्याग, (३) शरीर-मन-बुद्धि की शुद्धि, (४) भारतवर्ष का भौगोलिक परिचय, (५) बूँद-बूँद से घड़ा भरने का उदाहरण, (६) पठन-लेखन से बुद्धिविकास, (७) मधुर वचन, (८) आलस्य बनाम परिश्रम, (९) व्यास के वचनद्वय।
  • 5कठिन शब्द-अर्थ: दीर्घसूत्रता = कार्य को आगे टालने की प्रवृत्ति; तन्द्रा = कर्महीनता; भूतिम् = वैभव/ऐश्वर्य; भूतात्मा = जीव/प्राणी।
03

मित्राय नमः

"Mitraya Namah" (Chapter 3, Class 7 Sanskrit Deepakam) is a dialogue-based lesson on Surya Namaskar (sun salutation) and the Sanskrit dative case (chaturthi vibhakti). यह पाठ सूर्यनमस्कार के बारह मंत्रों, उनके लाभों पर एक श्लोक तथा चतुर्थी विभक्ति और दा-धातु के रूपों का परिचय कराता है।

  • 1कथावस्तु: योगिता और मित्रों का संवाद — उद्यान से योगशिक्षिका तक; योगासन देखकर उत्साहित होना और सूर्यनमस्कार सीखना
  • 2सूर्यनमस्कार: बारह (द्वादश) आसनों का समाहार; प्रत्येक आसन से पहले एक मंत्र — ॐ मित्राय नमः से ॐ भास्कराय नमः तक, सर्वान्त में ॐ सवितृसूर्यनारायणाय नमः
  • 3केंद्रीय श्लोक: 'आदित्यस्य नमस्कारान् ये कुर्वन्ति दिने दिने। आयुः प्रज्ञा बलं वीर्यं तेजस्तेषां च जायते॥' — प्रतिदिन सूर्य-नमस्कार से आयु, बुद्धि, बल, वीरता और कान्ति मिलती है
  • 4व्याकरण: 'नमः' के साथ चतुर्थी विभक्ति (जैसे भास्कराय नमः); दानार्थे 'दा' और 'यच्छ्' धातु के साथ भी चतुर्थी विभक्ति
  • 5शब्दरूप: अकारान्त पुंलिङ्ग (छात्र, आदित्य), आकारान्त व ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग (आचार्या, नदी), अकारान्त नपुंसकलिङ्ग (आसन, फल) — चतुर्थी विभक्ति के एकवचन, द्विवचन, बहुवचन
04

न लभ्यते चेत् आम्लं द्राक्षाफलम्

"Na Labhyate Cet Amlam Drakshaphalam" is Chapter 4 of the NCERT Class 7 Sanskrit textbook Deepakam — a song-drama about a fox who fails to reach grapes and calls them sour. यह पाठ एक शृगाल (लोमड़ी) की कथा को संस्कृत गीत के रूप में प्रस्तुत करता है जिसमें वह अंगूर पाने में असफल होकर उन्हें 'खट्टे' कह देता है, साथ ही आत्मनेपदी धातुओं का लट्-लकार भी सिखाया जाता है।

  • 1पाठ एक गीत (साभिनय गान) के रूप में है जिसे कक्षा में गाया और अभिनय किया जाता है — 'एकः शृगालः' शीर्षक से गीत आरम्भ होता है।
  • 2प्रमुख पात्र: शृगाल (लोमड़ी) — वह भूख-प्यास से वन जाता है, चारों दिशाओं में देखता है, द्राक्षालता पर अंगूर देखकर बार-बार उत्पतति (कूदता है), पर पा नहीं सकता।
  • 3केंद्रीय शिक्षा: जो वस्तु न मिले उसे बुरा कह देना बहाना है; योग्यताविस्तर के श्लोक सिखाते हैं कि उत्तम व्यक्ति विघ्नों के बावजूद प्रयास नहीं छोड़ता।
  • 4कठिन शब्द — बुभुक्षा = भूख; श्रान्तः = थका हुआ; खिन्नः = दुःखी; द्राक्षाफलम् = अंगूर; उत्पतति = कूदता है; पलायते = भाग जाता है; आम्लम् = खट्टा।
  • 5व्याकरण: आत्मनेपदी धातु 'लभ्' का लट्-लकार — प्रथम पुरुष: लभते / लभेते / लभन्ते; मध्यम पुरुष: लभसे / लभेथे / लभध्वे; उत्तम पुरुष: लभे / लभावहे / लभामहे। अभ्यास में पलाय्, जाय्, वन्द्, कम्प्, वर्ध्, वीक्ष्, सेव् आदि धातुओं के रूप भी हैं।
05

सेवा हि परमो धर्मः

Seva Hi Paramo Dharma is a Sanskrit story-lesson in Class 7 Deepakam (Chapter 5) that uses the legendary physician Nagarjuna's test to show that service to others is the highest human duty. इस पाठ में नागार्जुन एक चतुर परीक्षा के माध्यम से सिद्ध करते हैं कि सेवाभावना के बिना कोई सच्चा चिकित्सक नहीं बन सकता।

  • 1कथावस्तु: नागार्जुन (प्रसिद्ध रसायनशास्त्रज्ञ एवं चिकित्सक) को सहायक की आवश्यकता थी; उन्होंने महाराज की सहायता से दो युवकों को बुलाया और राजमार्ग पर एक रोगी रखकर उनकी परीक्षा ली।
  • 2केंद्रीय शिक्षा: नागार्जुन के शब्दों में — 'सेवाभावनां विना चिकित्सकः कथं भवेत्?' — सेवाभावना के बिना कोई सच्चा चिकित्सक नहीं बन सकता; सेवा ही परम धर्म है।
  • 3प्रमुख पात्र: नागार्जुन (रसायनशास्त्रज्ञ-चिकित्सक), महाराज, प्रथम युवक (यन्त्रवत् कार्य करने वाला), द्वितीय युवक (रोगी की सेवा करने वाला)।
  • 4मानवीय गुण: पाठ में बताया गया है कि सत्यं, करुणा, उदारता, सेवा, परोपकारः, अक्रोध — ये मानवीय गुण जीवन की वास्तविक सफलता के लिए आवश्यक हैं।
  • 5कठिन शब्द: रसायनशास्त्रज्ञः = रसायन शास्त्र का विशेषज्ञ; यन्त्रवत् = यन्त्र की भाँति; शोचनीया = दयनीय/दुःखदायी; खिन्नः = दुःखी; निरतः = मग्न।
06

क्रीडाम वयं श्लोकान्त्याक्षरीम्

Kridama Vayam Shlokantyaksharim (Class 7 Sanskrit, Deepakam, Chapter 6) is a dialogue-based chapter in which students play a Sanskrit shloka-antakshari game — बारिश के कारण घर में रहकर दीपिका, भारती और उनकी सखियाँ दो दलों में बँटकर विद्या की महिमा पर आधारित दस सुभाषित श्लोकों की अन्त्याक्षरी खेलती हैं।

  • 1पाठ का विषय: यह पाठ एक संवाद और खेल पर आधारित है जिसमें छात्राएँ वर्षा के दिन संस्कृत श्लोकों की अन्त्याक्षरी खेलती हैं; बाहर जाने की आवश्यकता नहीं — यह घर के भीतर खेली जाने वाली नूतन क्रीडा है।
  • 2खेल का नियम: दो दल — ज्ञानमाला और रत्नमाला — बनाए जाते हैं; एक दल का सदस्य श्लोक गाता है और उस श्लोक के अन्तिम व्यञ्जन वर्ण से दूसरे दल का सदस्य नया श्लोक गाता है, इसी क्रम में खेल चलता रहता है।
  • 3केंद्रीय शिक्षा: दसों श्लोक विद्या की महत्ता बताते हैं — विद्या मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ आभूषण है, गुप्त धन है, राजसभा में पूजनीय है और विद्याहीन व्यक्ति पशु के समान है।
  • 4प्रमुख पात्र: दीपिका, भारती और उनकी सखियाँ; दो दल — ज्ञानमाला (प्रथम गण) और रत्नमाला (द्वितीय गण)।
  • 5मुख्य श्लोक (श्लोक ६, रत्नमाला): विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्‍तं धनं, विद्या भोगकरी यशःसुखकरी विद्या गुरूणां गुरु: । विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परा देवता, विद्या राजसु पूज्यते न हि धनं विद्याविहीन: पशु: ।।
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ईशावास्यम् इदं सर्वम्

"Ishavasyam Idam Sarvam" is a Sanskrit play (natak) in Class 7 Deepakam that dramatises the story of Prahlada, Hiranyakashipu, Holika, and the Narasimha avatar. यह पाठ इस सत्य का संदेश देता है कि ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है — 'ईशावास्यमिदं सर्वम्' — देवालय में ही नहीं, वृक्ष, शिला और स्तम्भ तक में।

  • 1पाठ का विषय: यह एक नाटक है जो प्रह्लाद, हिरण्यकशिपु, होलिका और नृसिंहावतार की कथा पर आधारित है; कक्षा के छात्र-छात्राएँ इसका अभिनय भी करते हैं।
  • 2केंद्रीय शिक्षा (नैतिक सन्देश): 'ईशावास्यमिदं सर्वम्' — ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है; प्रह्लाद ने यह सत्य सिद्ध किया कि हरि देवालय, वृक्ष, शिला और स्तम्भ — सब में हैं।
  • 3प्रमुख पात्र: हिरण्यकशिपु (दैत्यराज), प्रह्लाद (विष्णुभक्त पुत्र), होलिका (हिरण्यकशिपु की बहन), नृसिंह (विष्णु-अवतार), मन्त्री, सेनापति, दैत्यपुरोहित।
  • 4व्याकरण — तृतीया विभक्ति: (क) उपकरण/साधन के लिए (जैसे खड्गेन स्तम्भं भञ्जयति), (ख) क्रियाविशेषण-स्वभाव के लिए (जैसे क्रोधेन गर्जति); पुल्लिंग, स्त्रीलिंग, नपुंसकलिंग तीनों की पूर्ण तालिका दी गई है।
  • 5व्याकरण — लृट् लकार (भविष्यत् काल): पठ् धातु के सभी पुरुष-वचन के रूप (पठिष्यति, पठिष्यतः, पठिष्यन्ति; पठिष्यसि; पठिष्यामि आदि) पाठ में दिए गए हैं।
08

हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः

Hitam Manohari ca Durlabham Vacah (पाठ 8, दीपकम्, कक्षा 7) संस्कृत साहित्य की दस प्रसिद्ध सूक्तियों का संग्रह है। यह पाठ विद्यार्थियों को जीवन-मूल्यों से परिचित कराता है और सिखाता है कि हितकारक तथा मनोहारी — दोनों गुणों वाला वचन अत्यंत दुर्लभ होता है।

  • 1विषय: अथर्ववेद, कुमारसम्भवम्, पञ्चतन्त्रम्, उत्तररामचरितम्, नीतिशतकम् और किरातार्जुनीयम् से संकलित दस जीवनोपयोगी सूक्तियाँ।
  • 2केंद्रीय शिक्षा: वह वचन दुर्लभ है जो एक साथ हितकारक भी हो और मनोहारी भी — 'हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः'।
  • 3प्रमुख सूक्तियाँ: 'शीलं परं भूषणम्' (चरित्र सर्वश्रेष्ठ आभूषण है); 'शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्' (शरीर ही धर्म का पहला साधन है); 'यस्तु क्रियावान् पुरुषः स विद्वान्' (जो कर्मशील है वही वास्तविक विद्वान है)।
  • 4गुण और सम्मान: 'गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिङ्गं न च वयः' — गुणी व्यक्ति का सम्मान लिंग और आयु से नहीं, केवल गुणों से होता है।
  • 5विद्यार्जन की विधि: 'क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत्' — प्रत्येक पल का उपयोग विद्या के लिए और प्रत्येक कण का संग्रह धन के लिए करना चाहिए।
09

अन्नाद् भवन्ति भूतानि

Annad Bhavanti Bhutani (Class 7 Sanskrit, Deepakam, Chapter 9) is a dialogue between a mother and daughter that explains the Vedic order of creation — from Brahman to space, air, fire, water, earth, plants, food, and finally all living beings. यह पाठ माँ और पुत्री के संवाद के माध्यम से तैत्तिरीयोपनिषत् पर आधारित सृष्टिक्रम और अन्न की महत्ता को सरल संस्कृत में समझाता है।

  • 1विषय/कथावस्तु: माँ (माता) और पुत्री के संवाद के माध्यम से भारतीय दर्शन के अनुसार सृष्टिक्रम प्रस्तुत किया गया है — यह संवाद जिज्ञासु बालिका के प्रश्नों से आरम्भ होता है।
  • 2सृष्टिक्रम (उत्पत्ति का क्रम): ब्रह्म → आकाश → वायु → अग्नि → जल → पृथिवी → ओषधी/सस्य/वृक्ष → आहार → कीट, प्राणी, मनुष्य।
  • 3केंद्रीय शिक्षा: अन्न से ही समस्त प्राणियों का जीवन सम्भव है; उपनिषद् ग्रन्थों में भारत का मौलिक ज्ञान निहित है और उन्हें अवश्य पढ़ना चाहिए।
  • 4प्रमुख पात्र: पुत्री (जिज्ञासु बालिका) और माता (जिन्होंने आधुनिक रसायनशास्त्र और उपनिषद् दोनों पढ़े हैं)।
  • 5मुख्य श्लोक (तैत्तिरीयोपनिषत् २-१-२): "ओषधिभ्योऽन्नम् । अन्नात् पुरुषः ॥" — ओषधियों से अन्न और अन्न से मनुष्य की उत्पत्ति हुई।
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दशमः कः?

Dashamah Kah (दशमः कः?) is a story-lesson in Class 7 Sanskrit (Deepakam, NEP edition) that teaches ordinal numbers through a humorous tale about ten boys who cannot find the 'tenth' among themselves. यह पाठ संवाद और कथा के माध्यम से क्रमसंख्यावाचक शब्दों (प्रथमः, द्वितीयः... दशमः) का परिचय देता है और सिखाता है कि गिनने वाला स्वयं ही दसवाँ था।

  • 1पाठ का विषय: संस्कृत ओलम्पियाड संवाद और 'दशमः कः?' कथा के माध्यम से क्रमसंख्यावाचक शब्दों (पूरण प्रत्ययान्त) का व्यावहारिक परिचय।
  • 2कथावस्तु: दश बालक नदी में स्नान कर लौटे; नायक स्वयं को भूलकर नौ ही गिनता है; एक पथिक ने समझाया — 'दशमः त्वम् असि' (तुम ही दसवें हो)।
  • 3केंद्रीय शिक्षा: दूसरों को गिनते समय स्वयं को भी गिनना चाहिए — यही भूल सारी समस्या की जड़ थी।
  • 4प्रमुख पात्र: नायकः (बालकों का नेता), पथिकः (यात्री जिसने सत्य बताया), और दश बालक।
  • 5कठिन शब्द: तीर्त्वा = तैरकर; मग्नः = डूब गया; विषण्णाः = दुःखी; तूष्णीम् = मौन; पथिकः = यात्री; प्रहृष्टाः = प्रसन्न।
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द्वीपेषु रम्यः द्वीपोऽण्डमानः

Dvipeshu Ramyah Dvipo Andamanah is the 11th chapter of Class 7 Sanskrit Deepakam, a classroom dialogue exploring the history, freedom struggle significance, tribal communities, and natural beauty of the Andaman Islands. यह पाठ अण्डमान द्वीपसमूह के इतिहास, स्वतन्त्रता संग्राम में उसकी भूमिका, जनजातियों और पर्यटन स्थलों का संवाद-शैली में विस्तृत परिचय कराता है।

  • 1अण्डमान भारत के आठ केंद्रशासित प्रदेशों में से एक है; इसकी राजधानी श्रीविजयपुरम् है — अंग्रेजी शासन में इसे 'पोर्ट-ब्लेयर' कहा जाता था।
  • 2रामायण काल में इस द्वीप का नाम 'हण्डुकमान्' था, जो संभवतः 'हनुमान्' शब्द का परिवर्तित रूप है; प्रथम शताब्दी में इसे 'अगादेमन्' और बाद में 'अङ्गादेमन्' कहा जाने लगा।
  • 3ब्रिटिशों द्वारा निर्मित 'सेल्युलर कारागार' (कालापानी) स्वतंत्रता सेनानियों के दमन के लिए था; स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने वहाँ दस वर्षों तक कल्पनातीत घोर कष्ट सहा और यह UNESCO की वैश्विक संपदा सूची में संरक्षित है।
  • 4अण्डमान में अण्डमानी, ओङ्गी, जारवा और सेण्टिनली जनजातियाँ निवास करती हैं; सेण्टिनली जनजाति समाज से दूर रहती है।
  • 5राधानगर तट, महात्मागाँधी मरीन राष्ट्रीय उद्यान, स्वराजद्वीप, नॉर्थ-बे द्वीप और समुद्रिका संग्रहालय प्रमुख पर्यटन स्थल हैं; स्वराजद्वीप में स्कूबाडाइविंग और स्नॉर्कलिंग की सुविधा है।
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वीराङ्गना पन्नाधाया

Virangana Pannadhaya is Chapter 12 of Class 7 Sanskrit Deepakam — a historical prose story about Panna Dhay, the legendary wet nurse of Mewar who sacrificed her own son to save the life of prince Udai Singh. यह पाठ राजस्थान की वीराङ्गना पन्नाधाया के अद्वितीय त्याग और राष्ट्रभक्ति की ऐतिहासिक कथा है।

  • 1कथावस्तु: यह पाठ सोलहवीं शताब्दी के मेवाड (राजस्थान) में पन्नाधाया के अदम्य साहस और त्याग की ऐतिहासिक गद्यकथा है।
  • 2केन्द्रीय शिक्षा: 'व्यक्तिहितं न, राष्ट्रहितम् एव श्रेष्ठम्' — पन्नाधाया का बलिदान शौर्य, राष्ट्रभक्ति, कर्तव्यनिष्ठा और विवेक की शिक्षा देता है।
  • 3प्रमुख पात्र: पन्नाधाया (धाया/दाई), उदयसिंह (महाराणा सङ्ग्रामसिंह के पुत्र), बनवीर (दुष्टबुद्धि षड्यन्त्रकारी), चन्दन (पन्नाधाया का पुत्र — जिसका बलिदान हुआ), महाराणाप्रताप (उदयसिंह के पुत्र — वीर योद्धा)।
  • 4प्रमुख उद्धरण: "यदि पन्नाधाया नाभविष्यत् तर्हि कुतो राणाप्रतापः" — यदि पन्नाधाया न होती तो महाराणाप्रताप भी न होते।
  • 5कठिन शब्द: कुतन्त्रम् = षड्यन्त्र; छलेन = कपट से; धाया = धात्री/दाई; आचन्द्रार्कम् = जब तक सूर्य और चन्द्रमा हैं (सदा के लिए); प्रतिस्पर्धी = प्रतिद्वन्द्वी।
13

वर्णमात्रा-परिचयः (अतिरिक्तम् अध्ययनम्)

Varnamatra-Parichayah (वर्णमात्रा-परिचयः) is a grammar chapter in Class 7 Sanskrit Deepakam that introduces the concept of mātrā — the duration of sound — for vowels and consonants. यह पाठ संस्कृत में स्वरों की तीन मात्राओं (ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत) और व्यंजनों की अर्धमात्रा का परिचय संवाद-शैली में देता है।

  • 1व्याकरण-विषय: संस्कृत में वर्णों की चार प्रकार की मात्राएँ होती हैं — स्वरों की तीन (ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत) और व्यंजनों की एक (अर्धमात्रा)।
  • 2स्वरों के तीन उपभेद: एकमात्र = ह्रस्व (अ, इ, उ आदि); द्विमात्र = दीर्घ (आ, ई, ऊ आदि); त्रिमात्र = प्लुत (अ३, इ३, ओ३म् आदि)। संस्कृत में कुल २२ स्वर होते हैं।
  • 3प्लुत स्वर का प्रयोग दो संदर्भों में होता है — (क) दूर से किसी को पुकारने पर, जैसे 'हे३ राम!' और 'कुमार३'; (ख) वैदिक मंत्रों के प्रारंभ में, जैसे 'ओ३म्'।
  • 4याज्ञवल्क्य-शिक्षा का श्लोक: "एकमात्रो भवेद् ह्रस्वः द्विमात्रो दीर्घ उच्यते। त्रिमात्रश्च प्लुतो ज्ञेयः व्यञ्जनं चार्धमात्रिकम्॥" — यह मात्राओं का मूल नियम है।
  • 5पाणिनीय-शिक्षा के श्लोक में पशु-पक्षियों की ध्वनि से उदाहरण: चाषः (नीलकण्ठ) = एकमात्र, वायसः (कौआ) = द्विमात्र, शिखी (मोर) = त्रिमात्र, नकुलः (नेवला) = अर्धमात्र।
14

परिशिष्टम् १: शब्दरूपाणि

Parishishtam 1: Shabdarupani is an appendix chapter in Class 7 Sanskrit (Deepakam) that provides complete noun and pronoun declension tables. यह परिशिष्ट संस्कृत के पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग, नपुंसकलिङ्ग शब्दों तथा सर्वनामों के शब्दरूप (विभक्ति-तालिकाएँ) प्रस्तुत करता है।

  • 1इस परिशिष्ट में अजन्त (स्वर से अन्त होने वाले) शब्दों के शब्दरूप हैं — प्रत्येक शब्द की आठ विभक्तियों (प्रथमा से सम्बोधन तक) और तीन वचनों (एकवचन, द्विवचन, बहुवचन) में तालिका दी गई है।
  • 2पुंलिङ्ग शब्दरूप: 'अ'कारान्त देव/राम, 'इ'कारान्त कवि/हरि, 'उ'कारान्त शम्भु/गुरु, 'ॠ'कारान्त पितृ/नेतृ।
  • 3स्त्रीलिङ्ग शब्दरूप: 'आ'कारान्त माला/रमा, 'इ'कारान्त मति/कीर्ति, 'ई'कारान्त नदी/गौरी, 'उ'कारान्त धेनु, 'ॠ'कारान्त मातृ।
  • 4नपुंसकलिङ्ग शब्दरूप: 'अ'कारान्त फल/मित्र — इनकी प्रथमा और द्वितीया एकवचन एवं द्विवचन के रूप समान होते हैं।
  • 5सर्वनाम शब्दरूप: तद् (सः/सा/तत्), एतद् (एषः/एषा/एतत्), किम् (कः/का/किम्) के तीनों लिङ्गों में रूप; साथ ही अस्मद् (अहम्, आवाम्, वयम्) और युष्मद् (त्वम्, युवाम्, यूयम्) के रूप दिए गए हैं।
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परिशिष्टम् २: धातुरूपाणि

Parishishtam 2: Dhaturupani is the second appendix of the Class 7 Sanskrit textbook 'Deepakam', providing complete verb-conjugation tables (dhaturupani) for five lakaras — Lat (present), Lrit (future), Lang (past), Lot (imperative) and Vidhiling (optative) — along with an introduction to Sanskrit sandhi rules. इस परिशिष्ट में परस्मैपदी तथा आत्मनेपदी धातुओं के पाँच लकारों की रूप-तालिकाएँ और स्वरसन्धि के नियम उदाहरण सहित दिए गए हैं।

  • 1धातु तीन प्रकार के होते हैं — (१) परस्मैपदी, (२) आत्मनेपदी और (३) उभयपदी; प्रत्येक के तिङ्-प्रत्यय भिन्न होते हैं।
  • 2लट्-लकार (वर्तमानकाल): 'पठ्' (परस्मैपदी) और 'भाष्' (आत्मनेपदी) की पूर्ण रूप-तालिका; विशेष धातु — अस्, कृ, श्रु, दा, ज्ञा, क्री के रूप भी दिए गए हैं।
  • 3लृट्-लकार (भविष्यत्काल): 'पठ्' → पठिष्यति, 'लिख्' → लेखिष्यति; 'अस्' धातु का भविष्यत् रूप 'भू' धातु से बनता है (भविष्यति)।
  • 4लङ्-लकार (भूतकाल): सभी रूपों में 'अ'-उपसर्ग (अगम) जुड़ता है; जैसे 'पठ्' → अपठत्, 'अस्' → आसीत्, 'कृ' → अकरोत्।
  • 5लोट्-लकार और विधिलिङ्-लकार: आज्ञा, प्रार्थना, विधि, निमन्त्रण और आमन्त्रण के प्रसंगों में प्रयुक्त; जैसे पठतु (लोट्), पठेत् (विधिलिङ्)।

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