Class 12 Sanskrit

Chapter 2 — Raghukauttasa Samvadah

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Overview

Summary

NCERT Class 12 Sanskrit Shaswati Raghukauttasa Samvadah महाकवि कालिदास-रचित 'रघुवंश' महाकाव्य के पंचम सर्ग से संकलित पाठ है, जिसमें साकेत नगरी में महाराज रघु और ऋषि वरतन्तु के शिष्य कौत्स के बीच हुए संवाद का वर्णन है।

यह पाठ कालिदास-रचित 'रघुवंश' महाकाव्य के पंचम सर्ग से लिया गया है। वरतन्तु ऋषि के शिष्य कौत्स ने 14 विद्याओं का अध्ययन पूर्ण कर गुरुदक्षिणा में 14 करोड़ स्वर्णमुद्राएँ लाने की आज्ञा पाई। वह विश्वजित् यज्ञ में सम्पूर्ण धन दान कर चुके महाराज रघु के पास पहुँचा। रघु ने कुबेर पर आक्रमण की योजना बनाई; भयभीत कुबेर ने कोषागार में स्वर्ण-वृष्टि की। रघु ने सारा धन कौत्स को सौंप दिया। कौत्स ने गुरु को देने से अधिक लेने की इच्छा नहीं रखी और रघु ने माँगे से भी अधिक दिया — दोनों साकेत-निवासियों द्वारा सराहे गए।

Essentials

Key points & formulas

  1. 01पाठ का स्रोत एवं विधा: महाकवि कालिदास-रचित 'रघुवंश' महाकाव्य का पंचम सर्ग; यह संस्कृत महाकाव्य की शैली में रचित संवाद-काव्यांश है।
  2. 02मुख्य पात्र: ब्रह्मचारी कौत्स (ऋषि वरतन्तु के शिष्य), महाराज रघु (साकेत के राजा), और कुबेर (धनपति)।
  3. 03कौत्स ने वेद, पुराण, वेदाङ्ग, दर्शन सहित 14 विद्याओं का अध्ययन पूर्ण किया और गुरुदक्षिणा में 14 करोड़ स्वर्णमुद्राएँ देने की आज्ञा पाई।
  4. 04केंद्रीय शिक्षा: शासक को सर्वसाधारण जन के प्रति उदार एवं कल्याणकारी होना चाहिए और याचक को आवश्यकता से अधिक प्राप्त करने की इच्छा नहीं रखनी चाहिए।
  5. 05प्रमुख श्लोक (श्लोक 1, वरतन्तुशिष्यः): 'तमध्वरे विश्वजिति क्षितीशं निःशेषविश्राणितकोषजातम् । उपात्तविद्यो गुरुदक्षिणार्थी कौत्सः प्रपेदे वरतन्तुशिष्यः ॥' — भावार्थ: विश्वजित् यज्ञ में सम्पूर्ण धन दान कर चुके राजा के पास, विद्या प्राप्त कर गुरुदक्षिणा की इच्छा से वरतन्तु के शिष्य कौत्स पहुँचे।
  6. 06प्रमुख श्लोक (श्लोक 20, अभिनन्द्यसत्त्वौ): 'जनस्य साकेतनिवासिनस्तौ द्वावप्यभूतामभिनन्द्यसत्त्वौ । गुरुप्रदेयाधिकनिःस्पृहोऽर्थी नृपोऽर्थिकामादधिकप्रदश्च ॥' — भावार्थ: साकेत-निवासियों के लिए दोनों ही प्रशंसनीय थे — याचक ने गुरु को देने से अधिक लेने की इच्छा नहीं रखी, और राजा ने माँगे से भी अधिक दिया।
  7. 07कठिन शब्दार्थ: 'विश्राणितम्' = दान में दिया हुआ; 'अनर्घशीलः' = असाधारण आचारवान्, महनीय स्वभाववाला; 'वार्तम्' = कुशलता, नीरोगता।
Questions

Frequently asked questions

01

रघुकौत्ससंवादः पाठ कहाँ से लिया गया है?

यह पाठ महाकवि कालिदास-रचित 'रघुवंश' महाकाव्य के पंचम सर्ग से संकलित है।

02

कौत्स कौन था और वह रघु के पास क्यों आया?

कौत्स ऋषि वरतन्तु के शिष्य थे। उन्होंने 14 विद्याओं का अध्ययन पूर्ण कर गुरुदक्षिणा में 14 करोड़ स्वर्णमुद्राएँ देने की आज्ञा पाई और उसी के लिए महाराज रघु के पास पहुँचे।

03

गुरु वरतन्तु ने गुरुदक्षिणा में कितना धन माँगा और क्यों?

बार-बार प्रार्थना करने पर रुष्ट होकर वरतन्तु ने 14 करोड़ स्वर्णमुद्राएँ माँगीं — विद्याओं की संख्या के अनुसार प्रति विद्या एक करोड़।

04

महाराज रघु के पास धन क्यों नहीं था?

महाराज रघु विश्वजित् नामक यज्ञ में सम्पूर्ण धन दान कर चुके थे, इसलिए उनका कोषागार रिक्त था।

05

कुबेर ने रघु के कोषागार में स्वर्ण-वृष्टि क्यों की?

जब रघु ने कुबेर पर आक्रमण की योजना बनाई, तो भयभीत कुबेर ने रघु के कोषागार में आकाश से हिरण्मयी वृष्टि कर दी।

06

Raghukauttasa Samvadah ka mool sandesh kya hai?

पाठ का संदेश है कि शासक को प्रजा के प्रति उदार एवं कल्याणकारी होना चाहिए और याचक को अपनी आवश्यकता से अधिक प्राप्त करने की इच्छा नहीं रखनी चाहिए।

07

NCERT Class 12 Sanskrit Shaswati chapter 2 mein Raghu ko kaisa Raja bataya gaya hai?

रघु को 'अनर्घशीलः' (महनीय स्वभाववाले), 'आतिथेयः' (अतिथि-सत्कार करने वाले), और 'जगदेकनाथः' (जगत के एकमात्र स्वामी) के रूप में चित्रित किया गया है। उन्होंने कौत्स से माँगे गए धन से भी अधिक दे दिया।

08

14 विद्याएँ कौन-सी हैं?

पाठ के योग्यताविस्तार भाग के अनुसार: चार वेद (ऋग्, साम, यजुर्, अथर्व), छः वेदाङ्ग (शिक्षा, व्याकरण, छन्द, निरुक्त, ज्यौतिष, कल्प), मीमांसा, आन्वीक्षिकी (न्यायविस्तर), अठारह पुराण, और धर्मशास्त्र।

09

Raghukauttasa Samvadah mein chaatak pakshi ka ullekh kyon hai?

श्लोक 9 में कौत्स रघु से कहता है — जिस शरद्-मेघ का जल निकल चुका हो उससे चातक भी याचना नहीं करता; अर्थात् जिनके पास धन नहीं उनसे माँगना उचित नहीं, इसलिए वह अन्यत्र जाने की बात करता है।

10

कालिदास के इस काव्यांश की भाषा-शैली की क्या विशेषता है?

पाठ में कालिदास की काव्यशैली सहृदयों के मन को रंजित करने वाली बताई गई है; उनके शब्द-संदर्भ सुललित, सुमधुर और प्रसन्न हैं।

11

Raghukauttasa Samvadah ka saransh Hindi mein likhiye

ऋषि वरतन्तु के शिष्य कौत्स 14 विद्याएँ पढ़कर 14 करोड़ स्वर्णमुद्राओं की गुरुदक्षिणा के लिए राजा रघु के पास पहुँचे। रघु यज्ञ में सब दान कर चुके थे। उन्होंने कुबेर पर आक्रमण की योजना बनाई; कुबेर ने भयभीत होकर स्वर्ण-वर्षा की। रघु ने सारा धन कौत्स को दे दिया। कौत्स ने गुरु-अंश से अधिक नहीं लिया — दोनों साकेत-नगर में सराहे गए।

12

क्या इस पाठ का PDF मुफ़्त डाउनलोड कर सकते हैं?

हाँ, यह मुफ़्त है, बिना साइन-अप।

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