Summary
NCERT Class 12 Sanskrit Shaswati Balakautukam महाकवि भवभूति द्वारा रचित प्रसिद्ध नाटक 'उत्तररामचरितम्' के चतुर्थ अंक से संकलित नाट्यांश है। इस पाठ में महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में बालक लव के वात्सल्यमय परिचय और अश्वमेधीय अश्व को बाँधने के साहसिक प्रसंग का मार्मिक चित्रण है।
यह पाठ भवभूति के 'उत्तररामचरितम्' नाटक के चतुर्थ अंक से लिया गया है। महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में पधारे राजर्षि जनक, कौसल्या और अरुन्धती खेलते बालकों में लव को देखकर उनमें राम एवं सीता की छाया पहचानते हैं और वात्सल्य-भाव से उन्हें गोद में बिठाते हैं। तभी राजा राम का अश्वमेधीय अश्व आश्रम में प्रवेश करता है। बालक लव उसे शास्त्र-ज्ञान से अश्वमेधीय पहचानकर बाँधने का आदेश देते हैं और रक्षकों की चुनौती पर निर्भीकतापूर्वक धनुष चढ़ा लेते हैं।
Key points & formulas
- 01स्रोत एवं विधा: यह पाठ महाकवि भवभूति के संस्कृत नाटक 'उत्तररामचरितम्' के चतुर्थ अंक से संकलित नाट्यांश है। भवभूति आठवीं शताब्दी में कान्यकुब्जेश्वर यशोवर्मण के समकालीन महाकवि थे जिन्होंने तीन नाटक रचे — मालतीमाधवम्, महावीरचरितम् और उत्तररामचरितम्।
- 02केन्द्रीय भाव: पाठ का शीर्षक 'बालकौतुकम्' ही इसका मूल विषय बताता है — बालक लव का बालसुलभ कौतूहल (घोड़ा देखने की उत्सुकता) और उनकी सहज क्षत्रिय-वीरता (अश्वमेधीय अश्व को बाँधने का आदेश, रक्षकों की धमकी पर धनुष चढ़ाना)।
- 03मुख्य पात्र एवं घटनाएँ: राजर्षि जनक, कौसल्या और अरुन्धती का लव में राम-सीता की झलक देखकर वात्सल्य-वर्षा; बटवों द्वारा अश्व का बालोचित वर्णन; लव का अश्वमेधीय अश्व पहचानना; रक्षकों की धमकी पर लव द्वारा धनुष चढ़ाना।
- 04प्रमुख श्लोक (कौसल्या, लव को देखकर): 'कुवलयदलस्निग्धश्यामः शिखण्डकमण्डनो वटुपरिषदं पुण्यश्रीकः श्रियैव सभाजयन् । पुनरपि शिशुर्भूतो वत्सः स मे रघुनन्दनो झटिति कुरुते दृष्टः कोऽयं दृशोरमृतांजनम् ॥' — भावार्थ: नील-कमल-दल के समान श्यामवर्ण, काकपक्ष-मण्डित यह अलौकिक बालक देखते ही आँखों में अमृत-अंजन जैसी शीतलता भर देता है; लगता है रघुनन्दन राम ही फिर से बालक बन गए हों।
- 05प्रमुख श्लोक (बटव, अश्व का वर्णन): 'पश्चात्पुच्छं वहति विपुलं तच्च धूनोत्यजड्डम् दीर्घग्रीवः स भवति, खुरास्तस्य चत्वार एव । शष्पाण्यत्ति, प्रकिरति शकृत्पिण्डकानाम्रमात्रन् किं व्याख्यानैर्व्रजति स पुनर्दूरमेह्येहि यामः ॥' — भावार्थ: वह पीछे विशाल पूँछ निरन्तर हिलाता है, लम्बी गर्दन और चार खुर हैं, घास खाता तथा आम-फल-जैसे गोबर के ढेर बिखेरता है — बातों में क्या रखा, चलो खुद देखते हैं।
- 06कठिन शब्दार्थ: 'पुण्यश्रीकः' = अलौकिक शोभासम्पन्न; 'सम्मोहस्थिरम्' = सीता-निर्वासन के शोकाघात से जड़ीभूत (संज्ञाशून्य-सा); 'निषङ्गिणः' = तरकसधारी (तूणीर रखने वाले); 'ऊर्जस्वलः' = शक्तिशाली।
- 07वात्सल्य एवं करुण भाव: करुण रस के अनुपम चितेरे भवभूति ने इस नाट्यांश में वात्सल्य का मर्मस्पर्शी चित्रण किया है। जनक का कथन — 'हा हा देवि किमुत्पथैर्मम मनः पारिप्लवं धावति' — सीता की पीड़ा की स्मृति में मन के उन्मार्ग पर दौड़ने का गहरा भाव व्यक्त करता है।
Frequently asked questions
01बालकौतुकम् पाठ किस नाटक से लिया गया है?
यह पाठ महाकवि भवभूति के प्रसिद्ध संस्कृत नाटक 'उत्तररामचरितम्' के चतुर्थ अंक से संकलित किया गया है।
02Balakautukam ke lekhak kaun hain?
बालकौतुकम् के रचयिता महाकवि भवभूति हैं। वे आठवीं शताब्दी के प्रसिद्ध संस्कृत नाटककार थे और उन्होंने तीन नाटक रचे — मालतीमाधवम्, महावीरचरितम् और उत्तररामचरितम्।
03इस पाठ के मुख्य पात्र कौन-कौन हैं?
पाठ के मुख्य पात्र हैं — लव (राम-सीता के पुत्र), राजर्षि जनक, कौसल्या, अरुन्धती, आश्रम के बटव (बालक) और चन्द्रकेतु के रक्षक पुरुष।
04लव कौन हैं और उनका पालन-पोषण कहाँ हुआ?
लव राजा राम और सीता के पुत्र हैं। निर्वासित सीता के जुड़वाँ पुत्रों लव एवं कुश का पालन-पोषण महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में हुआ। वाल्मीकि ने उन्हें शस्त्र, शास्त्र और रामायण के सस्वर गान की शिक्षा दी।
05NCERT Class 12 Sanskrit Shaswati Balakautukam mein ashwa ka kya prasang hai?
राजा राम का अश्वमेधीय अश्व, जिसकी रक्षा राजपुत्र चन्द्रकेतु करता है, वाल्मीकि के आश्रम में प्रवेश करता है। बालक लव उसे अश्वमेधीय पहचानकर बाँधने का आदेश देते हैं और रक्षकों की धमकी की परवाह न करते हुए धनुष चढ़ा लेते हैं।
06लव ने अश्वमेधीय अश्व को कैसे पहचाना?
लव ने पशुशास्त्र और संग्रामशास्त्र के ज्ञान के साथ-साथ अश्व के चारों ओर प्रत्येक सौ-सौ कवचधारी, दण्डधारी और तरकसधारी रक्षकों को देखकर पहचाना कि यह अश्वमेधीय अश्व है।
07कौसल्या ने लव को देखकर क्या अनुभव किया?
कौसल्या ने लव के शरीर-सौष्ठव और स्वर में रामभद्र की छाया पहचानी। उन्होंने कहा कि यह बालक न केवल देह में बल्कि कलहंस जैसे स्वर में भी राम का अनुसरण करता है। उन्होंने लव को गोद में उठाया और आशीर्वाद दिया — 'जात! चिरं जीव।'
08Balakautukam mein Janaka ne Lav ko dekhkar kya kaha?
जनक ने लव को देखकर कहा — 'वत्सायाश्च रघूद्वहस्य च शिशावस्मिन्नभिव्यज्यते' — अर्थात् इस बालक में सीता और राम दोनों की आकृति, कांति, वाणी और विनय अभिव्यक्त हो रहे हैं। साथ ही उन्होंने पीड़ा के साथ कहा कि उनका मन उन्मार्गों पर चंचल हो उठता है।
09पाठ में 'बालकौतुकम्' शीर्षक क्यों उचित है?
पाठ में लव का बालसुलभ कौतूहल (घोड़े को देखने की उत्सुकता) और उनकी क्षत्रिय-वीरता (अश्व बाँधने का आदेश, धनुष चढ़ाना) का समन्वय है। यही बालकौतुक — बालक की जिज्ञासा और वीरता — पाठ का केन्द्रीय विषय है।
10बटवों ने घोड़े का वर्णन कैसे किया?
बटवों ने बालोचित सरल भाषा में कहा — वह पीछे विशाल पूँछ निरन्तर हिलाता है, लम्बी गर्दन है, चार खुर हैं, घास खाता है और आम-फल जैसे गोबर के ढेर बिखेरता है। अन्त में बोले — 'किं व्याख्यानैर्व्रजति स पुनर्दूरमेह्येहि यामः' अर्थात् बातों में क्या रखा, चलो खुद देखते हैं।
11क्या इस पाठ का PDF मुफ़्त डाउनलोड कर सकते हैं?
हाँ, यह मुफ़्त है, बिना साइन-अप।
12भवभूति के बारे में क्या जानकारी पाठ में मिलती है?
पाठ के परिचय में बताया गया है कि भवभूति करुण रस के अनुपम चितेरे महाकवि हैं। वे आठवीं शताब्दी में कान्यकुब्जेश्वर यशोवर्मण के समकालीन थे। उनके तीन नाटक हैं — मालतीमाधवम्, महावीरचरितम् और उत्तररामचरितम्। विद्वत्समुदाय में यह उक्ति प्रसिद्ध है — 'उत्तरे रामचरिते भवभूतिर्विशिष्यते।'
13अश्वमेध यज्ञ क्या होता है?
पाठ के योग्यताविस्तार खण्ड में बताया गया है कि अश्वमेध यज्ञ प्राचीनकाल में राज्यविस्तार और राष्ट्र-समृद्धि के लिए किया जाता था। यज्ञकर्ता राजा अपने राष्ट्रीय प्रतीक-अश्व को सेना सहित भूमण्डल-भ्रमण के लिए भेजता था — जो राजा अश्व को रोकता उससे युद्ध होता था।
14Class 12 Sanskrit Shaswati Chapter 3 Balakautukam mein Lav ka charitra kaisa hai?
लव विनयशील हैं — वे बड़ों को क्रम से प्रणाम करते हैं ('एष वो लवस्य शिरसा प्रणामपर्यायः')। वे शास्त्र-ज्ञानी हैं — अश्वमेधीय अश्व को तुरन्त पहचान लेते हैं। और निर्भीक हैं — रक्षकों की धमकी पर भी 'किं नाम विस्फुरन्ति शस्त्राणि?' कहते हुए धनुष चढ़ा लेते हैं।
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