SanskritClass 10

Abhyaswaan Bhav (अभ्यासवान् भव)

Grammar & Practice14 Chapters

Chapter notes

What you'll learn in Abhyaswaan Bhav (अभ्यासवान् भव)

A quick revision map of Abhyaswaan Bhav (अभ्यासवान् भव) — the core idea and five key takeaways from each chapter. Tap any chapter to read the full NCERT PDF and detailed notes.

01

अपठितावबोधनम्

NCERT Class 10 Sanskrit Abhyaswaan Bhav Apathitavabodhanam (अपठितावबोधनम्) कक्षा 10 की संस्कृत कार्यपुस्तिका 'अभ्यासवान् भव' का पहला अध्याय है, जिसमें आठ अपरिचित संस्कृत गद्यांश दिए गए हैं और उन पर बोधपरक एवं व्याकरणपरक प्रश्न पूछे गए हैं। यह NCERT द्वारा प्रकाशित workbook है; कोई एकल लेखक नामित नहीं है।

  • 1स्रोत एवं विधा: NCERT कक्षा 10 संस्कृत कार्यपुस्तिका 'अभ्यासवान् भव' (Reprint 2026-27) का प्रथम अध्याय; विधा — अपठित गद्यावबोधन (Unseen Passage Comprehension)।
  • 2केंद्रीय कौशल: अपरिचित संस्कृत गद्यांश पढ़कर उसका अर्थ समझना और एकपद, पूर्णवाक्य तथा व्याकरण-आधारित प्रश्नों के उत्तर देना।
  • 3धात्रीफल गद्यांश: आमलक सर्वर्तुषु लाभदायक है — नेत्रज्योति, केशसौंदर्य, त्वचा-कांति, रक्तकोशिका-निर्माण और स्मरणशक्ति वर्धन में उपयोगी; कार्तिक नवमी को धात्रीवृक्ष के नीचे सहभोज की प्राचीन परंपरा भी उल्लिखित है।
  • 4सरदार पटेल गद्यांश: लौहपुरुष पटेल महोदय (जन्म: 31 अक्टूबर 1875) स्वतंत्र भारत के प्रथम उपप्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री थे; उनकी प्रतिमा 'एकताया: मूर्ति:' 182 मी./597 फीट ऊँची विश्व की उच्चतम मूर्ति है, जो सरदार-सरोवरबंध से लगभग 3 कि.मी. दूर साधूबेर उपद्वीप पर स्थित है।
  • 5परिश्रम गद्यांश में दो प्रमुख उद्धरण — 'उद्योगिनं पुरुष सिंहमुपैति लक्ष्‍मी:' (भाव: धन की देवी लक्ष्मी उद्यमी पुरुष के पास जाती हैं) और 'उद्यमेनैव ह‍ि सिध्‍यन्ति कार्याणि न मनोरथै:' (भाव: कार्य केवल परिश्रम से सिद्ध होते हैं, मनोरथों से नहीं); श्रीमद्भगवद्गीता का कर्म-महत्त्व भी स्मारित है।
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पत्रलेखनम्

NCERT Class 10 Sanskrit Abhyaswaan Bhav Patralekhanam — यह पाठ संस्कृत में पत्र-लेखन (Letter Writing) का व्यावहारिक कौशल-पाठ है, जिसमें अनौपचारिक एवं औपचारिक — दोनों प्रकार के पत्रों के आदर्श उदाहरण और अभ्यास प्रश्न दिए गए हैं; कोई एकल लेखक का नाम स्रोत में उल्लिखित नहीं है।

  • 1पाठ का स्वरूप एवं स्रोत: NCERT 'अभ्यासवान् भव' दशमकक्षा की संस्कृत पाठ्यपुस्तक का द्वितीय पाठ; यह साहित्यिक पाठ नहीं अपितु संस्कृत पत्र-लेखन का व्यावहारिक कौशल-पाठ है।
  • 2दो विभाग: (क) अनौपचारिकम् पत्रम् — परिवार, मित्र एवं अधिकारी को लिखे जाने वाले व्यक्तिगत पत्र; (ख) औपचारिकम् पत्रम् — कार्यालय, विद्यालय एवं संस्था को लिखे आवेदन-पत्र।
  • 3मुख्य पत्र-विषय (स्रोत से): चोरित स्यूत की पुलिस को प्राथमिक-सूचना; प्रधानाचार्य को एकादश कक्षा में विज्ञान विषय लेने की विशेष अनुमति का आवेदन; मित्र को जलसंरक्षण के महत्त्व पर पत्र; स्वस्थ भोजन के विषय में बड़ी बहन का छोटे भाई को पत्र; प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी हेतु पिता का पुत्र को पत्र।
  • 4केंद्रीय शिक्षा: पत्र की भाषा, प्रारूप एवं शिष्टाचार-भाव — जैसे 'सधन्यवादम्', 'करबद्धः अनुरोधः', 'सप्रेम नमो नमः', 'शुभाशिषो लसन्तु' — इन संस्कृत सम्बोधन-पदों का प्रयोग सिखाया गया है।
  • 5प्रमुख उक्ति (स्रोत में शब्दशः): स्वास्थ्य-पत्र में आई उक्ति — 'स्वस्थशरीरे एव स्वस्थमनसः वासः भवति' — अर्थ: स्वस्थ मन का निवास स्वस्थ शरीर में ही होता है।
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अनुच्छेदलेखनम्

NCERT Class 10 Sanskrit Abhyaswaan Bhav Anuchhedlekhanam 'अभ्यासवान् भव' कार्यपुस्तिका का तृतीय पाठ है जिसमें श्रवण-भाषण-कौशल के विकास हेतु ११ विविध विषयों पर आदर्श संस्कृत अनुच्छेद दिए गए हैं और अंत में छात्रों को स्वयं अनुच्छेद लिखने के लिए दस अभ्यास-विषय दिए गए हैं।

  • 1विधा एवं स्रोत: यह पाठ NCERT द्वारा प्रकाशित 'अभ्यासवान् भव' (दशमकक्षा) कार्यपुस्तिका का तृतीय अध्याय है; यह संस्कृत गद्यलेखन-अभ्यास और श्रवण-भाषण-कौशल-विकास पर आधारित है।
  • 2केंद्रीय भाव: छात्र ११ सामाजिक, पर्यावरणीय एवं नैतिक विषयों पर सरल संस्कृत में अनुच्छेद लिखना सीखते हैं; प्रत्येक नमूना अनुच्छेद विचार को सुसंगठित ढंग से प्रस्तुत करने की शैली दिखाता है।
  • 3प्रमुख श्लोक (वृक्षो रक्षति रक्षित: अनुच्छेद से, verbatim): 'पत्रपुष्पफलच्छायामूलवल्कलदारुभि: । गन्धनिर्यासभस्मास्थितोक्यै: कामान् वितन्वते ।।' — भावार्थ: वृक्ष अपने पत्र, पुष्प, फल, छाया, मूल, छाल, काष्ठ, सुगन्ध, रस, भस्म आदि से प्राणियों की कामनाएँ पूरी करते हैं।
  • 4प्रमुख उद्धरण (पुस्तकम् अनुच्छेद से, verbatim): 'सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध एव स:' — अर्थात् शास्त्र सबकी आँख है; जिसके पास शास्त्र-ज्ञान नहीं, वह अंधा ही है।
  • 5हीमादास: असम के एक अतिनिर्धन कृषक परिवार में 9 जनवरी 2000 को जन्म; नियमित प्रशिक्षण और सुविधाओं के अभाव में भी IAAF की बीस-वर्ष-पर्यन्त-वयस की धावन प्रतियोगिता में स्वर्णपदक जीतकर भारतवर्ष को गौरवान्वित किया।
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चित्रवर्णनम्

NCERT Class 10 Sanskrit Abhyaswaan Bhav Chitravarnanam (चित्रवर्णनम्) यह पाठ संस्कृत लेखन-कौशल का अभ्यास-पाठ है जिसमें छात्र दस भिन्न चित्रों को देखकर मञ्जूषा के सहारे संस्कृत में वाक्य बनाना सीखते हैं; इस पाठ में कोई गद्यांश या पद्य नहीं है।

  • 1पाठ का स्वरूप — यह शुद्ध लेखन-अभ्यास पाठ है; इसमें कोई कहानी, कविता, गद्यांश या कोई लेखक/कवि का उल्लेख नहीं है। दस चित्रों पर आधारित वाक्य-निर्माण के अभ्यास हैं।
  • 2मञ्जूषा का प्रयोग — पाठ में स्पष्ट निर्देश है कि 'प्रत्येक चित्र के साथ दी गयी मञ्जूषा में प्रदत्त पद छात्रों की सहायता के लिए हैं, किन्तु उनका प्रयोग अनिवार्य नहीं है। छात्र स्वेच्छा से भी वाक्य संरचना कर सकते हैं।'
  • 3दस चित्रों के विषय — (१) रक्षाबन्धन, (२) बाढ़ में सैनिकों द्वारा हेलीकॉप्टर-राहत, (३) सीमा पर देशरक्षक और आतंकवादी, (४) रेल-दुर्घटना एवं चिकित्सा-सहायता, (५) यातायात-नियम और हेलमेट, (६) वर्षाऋतु में मेंढक और इन्द्रधनुष, (७) सड़क-दुर्घटना और पुलिस, (८) फल-बाज़ार, (९) बालिकाओं की धावन-प्रतियोगिता, (१०) किसान और खेती।
  • 4उदाहरणवाक्य (प्रथम चित्र से, स्रोत-सम्मत) — 'अत्र रक्षाबन्धनपर्वणि आयोजनं भवति।' तथा 'मातापितरौ रक्षाबन्धनं दृष्ट्वा मोदेते।' — ये वाक्य पाठ में दिए गए नमूने हैं।
  • 5केन्द्रीय शिक्षा — चित्र देखकर संस्कृत वाक्य बनाने से शब्द-भण्डार, क्रियारूप और वाक्य-संरचना का व्यावहारिक अभ्यास होता है।
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रचनानुवादः

NCERT Class 10 Sanskrit Abhyaswaan Bhav Rachananuvadah (रचनानुवाद:) दशमकक्षा की संस्कृत वर्कबुक 'अभ्यासवान् भव' का पाँचवाँ पाठ है, जिसमें वाक्यरचना-कौशल के अंतर्गत विभक्ति, प्रत्यय और लकार के सही प्रयोग द्वारा हिंदी वाक्यों का संस्कृत में अनुवाद करना सिखाया गया है।

  • 1स्रोत एवं विधा — NCERT वर्कबुक 'अभ्यासवान् भव', दशमकक्षा, पाठ 5; विधा — व्याकरण एवं वाक्यरचना-कौशल (अनुवाद-अभ्यास)
  • 2केंद्रीय भाव — संस्कृत में शुद्ध अनुवाद के लिए सही विभक्ति, उपयुक्त प्रत्यय और काल के अनुसार सही लकार का ज्ञान अनिवार्य है
  • 3आठ विभक्तियाँ और कारक — प्रथमा (कर्ता), द्वितीया (कर्म), तृतीया (करण), चतुर्थी (सम्प्रदान), पञ्चमी (अपादान), षष्ठी (सम्बन्ध), सप्तमी (अधिकरण), सम्बोधन — पाठ की तालिका के अनुसार
  • 4पाँच प्रमुख लकार — लट् (वर्तमानकाल), लृट् (भविष्यत्काल), लङ् (भूतकाल), लोट् (आज्ञार्थ/आदेशार्थ), विधिलिङ् (विध्यर्थ/सम्भावनार्थ); दश लकारों में से ये पाँच पाठ में विस्तार से दिए गए हैं
  • 5स्रोत से उद्धरण — 'विद्यया विना जीवनं व्यर्थम्।' — भावार्थ: विद्या के बिना जीवन निरर्थक है; 'विना' के साथ द्वितीया/तृतीया विभक्ति का प्रयोग समझाने हेतु पाठ में दिया गया वाक्य
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सन्धिः

NCERT Class 10 Sanskrit Abhyaswaan Bhav Sandhih — यह पाठ संस्कृत व्याकरण के सन्धि विषय पर आधारित है जिसमें शिक्षक और छात्रों के संवाद के माध्यम से स्वरसन्धि, व्यञ्जनसन्धि, विसर्गसन्धि, अनुनासिकसन्धि और तुक् आगम-सन्धि के नियम सिखाए गए हैं।

  • 1पाठ का स्रोत/विधा: NCERT अभ्यासवान् भव (दशमकक्षा) की संस्कृत व्याकरण कार्यपुस्तिका, संवाद-रूप में प्रस्तुत — शिक्षक और पाँच छात्रों (नीरज, आदित्य, उमेश, औजस, अदिति) के बीच प्रश्नोत्तर द्वारा सन्धि के नियम सिखाए गए।
  • 2शिक्षक ने छात्रों के नामों को जोड़कर 'नीरजादित्योमेशौजस:' बनाया — इसमें क्रमशः दीर्घसन्धि (नीरज+आदित्य), गुणसन्धि (नीरजादित्य+उमेश) और वृद्धिसन्धि (+औजस:) का प्रयोग है।
  • 3स्वरसन्धि के छह भेद (षड्भेदा:): दीर्घ, गुण, वृद्धि, यण्, अयादि और पूर्वरूप। पाठ में बताया गया कि दशमकक्षा में केवल ये छह भेद पढ़े जाते हैं।
  • 4अयादिसन्धि 'एचोऽयवायाव:' नियम पर आधारित है — ए, ऐ, ओ, औ के बाद कोई स्वर आने पर क्रमशः अय्, आय्, अव्, आव् हो जाते हैं; इन चारों को 'अयादिचतुष्टयम्' भी कहा गया है।
  • 5पूर्वरूपसन्धि 'एङ: पदान्तादति' नियम पर आधारित है — पदान्त के ए या ओ के बाद अकार आने पर पूर्वरूप (ए/ओ) ही रहता है और अकार 'ऽ' (अवग्रह) चिह्न से दर्शाया जाता है। उदाहरण: सर्वे+अपि = सर्वेऽपि।
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समासः

NCERT Class 10 Sanskrit Abhyaswaan Bhav Samasah (समासाः) संस्कृत व्याकरण का सातवाँ पाठ है जो समास अर्थात् सामासिक शब्द-निर्माण की अवधारणा सिखाता है। इस पाठ में श्रुति और अनुकृति के संवाद के माध्यम से समास के चार मुख्य भेदों — अव्ययीभाव, तत्पुरुष, द्वन्द्व और बहुव्रीहि — को उदाहरण एवं अभ्यास सहित समझाया गया है।

  • 1पाठ का स्रोत: NCERT अभ्यासवान् भव, दशमकक्षा — यह एक शुद्ध व्याकरण-पाठ है; समास (सामासिक शब्द-निर्माण) इसका केंद्रीय विषय है।
  • 2केंद्रीय परिभाषा: 'शब्दानां पृथक्-पृथक् लेखनं विग्रह: कथ्यते तथैव समस्तरूपेण (संक्षिप्तरूपेण) वा लेखनं समास: इति कथ्यते।' — अर्थात् संक्षिप्त संयुक्त रूप समास और उसका विस्तार विग्रह है।
  • 3अव्ययीभाव: पूर्वपद प्रधान; समस्तपद सदा नपुंसकलिंग में; पूर्वपद अव्यय या उपसर्ग होता है। उदाहरण — 'यथामति' (मतिम् अनतिक्रम्य), 'प्रतिदिनम्' (दिने दिने इति), 'निर्विघ्नम्' (विघ्नानाम् अभाव:)।
  • 4तत्पुरुष: उत्तरपद प्रधान; पूर्वपद में द्वितीया से सप्तमी तक विभिन्न विभक्तियाँ। उदाहरण — 'ग्रामगत:' (ग्रामं गत:, द्वितीया), 'गृहपति:' (गृहस्य पति:, षष्ठी), 'असत्यम्' (न सत्यम्, नञ्-तत्पुरुष)।
  • 5कर्मधारय एवं द्विगु (तत्पुरुष के भेद): कर्मधारय में विशेषण-विशेष्य या उपमान-उपमेय होते हैं — 'सिंहपुरुष:' (सिंह इव पुरुष:); द्विगु में प्रथम पद संख्यावाचक होता है — 'नवरात्रम्' (नवानां रात्रीणां समाहार:), 'त्रिलोकम्' (त्रयाणां लोकानां समाहार:)।
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प्रत्ययाः

NCERT Class 10 Sanskrit Abhyaswaan Bhav Pratyayah यह पाठ संस्कृत व्याकरण के प्रत्ययों पर केंद्रित है — शब्द या धातु के अंत में जुड़ने वाले शब्दांश जो अर्थ बदलते हैं। इस पाठ में कृदन्त (शतृ, शानच्, तव्यत्, अनीयर्), तद्धित (मतुप्/वतुप्, इन्, त्व/तल्, ठक्) तथा स्त्री-प्रत्ययों (टाप्, ङीप्) का सोदाहरण अभ्यास है; स्रोत में किसी विशेष लेखक का नाम नहीं दिया गया है।

  • 1पाठ का स्रोत एवं विधा: NCERT कक्षा 10 संस्कृत अभ्यासवान् भव (व्याकरण-अभ्यास पुस्तिका); यह पाठ सोदाहरण व्याकरण विश्लेषण है — कोई कथा या कवि नहीं।
  • 2केंद्रीय परिभाषा (स्रोत से): 'शब्दस्य धातो: वा अन्ते ये शब्दांशा: प्रयुज्यन्ते ते प्रत्यया: भवन्ति' — प्रत्यय शब्द या धातु के अंत में जुड़ने वाले शब्दांश हैं जो अर्थ बदलते हैं।
  • 3शतृ-प्रत्यय परस्मैपदी धातुओं के साथ विशेषण बनाता है (पठ्+शतृ = पठत्); शानच् आत्मनेपदी धातुओं के साथ (वृध्+शानच् = वर्धमान:); दोनों तीनों लिंगों में बनते हैं।
  • 4तव्यत्-प्रत्यय विधिलिङ् (चाहिए) के अर्थ में कर्मवाच्य में आता है (पठ्+तव्यत् = पठितव्य:); अनीयर्-प्रत्यय योग्यार्थ में (पठ्+अनीयर् = पठनीय); दोनों में कर्ता तृतीया और कर्म प्रथमा में होता है।
  • 5अनीयर् खंड में स्रोत में बार-बार आने वाली पंक्ति: 'लोकहितं मम करणीयम्' — जन-कल्याण ही मेरा कर्तव्य है, यह भाव इस काव्यांश का मूल है।

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